लीची से मखाना तक.. डॉ. गोपालजी त्रिवेदी ने बदल दी बिहार के किसानों की जिंदगी, पद्मश्री से होंगे सम्मानित
बिहार के प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक गोपालजी त्रिवेदी को खेती में नवाचार और किसानों की आय बढ़ाने के लिए पद्मश्री सम्मान मिला. लीची, मखाना और आधुनिक खेती तकनीकों के जरिए उन्होंने हजारों किसानों की जिंदगी बदली. उनका योगदान आज बिहार की कृषि क्रांति और वैज्ञानिक खेती की नई पहचान बन चुका है.
Padma Shri 2026: बिहार की खेती को नई पहचान देने वाले कृषि वैज्ञानिक डॉ. गोपालजी त्रिवेदी (Dr. Gopalji Trivedi) को देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया जाएगा. उन्होंने सिर्फ नई खेती की तकनीक नहीं दी, बल्कि हजारों किसानों की जिंदगी बदलने का काम किया. मुजफ्फरपुर की लीची को नई पहचान दिलाने से लेकर जलजमाव वाली जमीन पर मखाना और सिंघाड़े की खेती शुरू कराने तक, उनका योगदान कई दशकों तक फैला रहा. किसानों के बीच रहकर काम करने वाले डॉ. त्रिवेदी आज बिहार की कृषि क्रांति का बड़ा चेहरा माने जाते रहे हैं.
संघर्ष भरा बचपन, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी
डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मतलूपुर गांव में एक किसान परिवार में हुआ था. बचपन से ही वे पढ़ाई में बहुत तेज थे. लेकिन दसवीं कक्षा के दौरान उनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद परिवार आर्थिक संकट में आ गया. हालात ऐसे बने कि उन्हें खेती का काम संभालना पड़ा. कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. मां और शिक्षकों के सहयोग से उन्होंने आगे की पढ़ाई जारी रखी. एक पोस्टकार्ड पर आवेदन लिखकर उन्होंने पूसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया और छात्रवृत्ति भी हासिल की. आगे चलकर उन्होंने कृषि विस्तार विषय में पीएचडी की और प्रोफेसर, निदेशक और कुलपति जैसे बड़े पदों पर काम किया.
सूखते लीची बागानों में फिर से भरी जान
मुजफ्फरपुर की लीची आज देश और विदेश में मशहूर है. लेकिन एक समय ऐसा भी था जब पुराने लीची बागान कमजोर होते जा रहे थे और किसानों की आय घट रही थी. उस समय डॉ. त्रिवेदी ने री-जुवनेशन कैनोपी मैनेजमेंट तकनीक शुरू की. इस तकनीक में पुराने पेड़ों की वैज्ञानिक तरीके से कटाई-छंटाई और देखभाल की जाती थी. इसका असर कुछ ही वर्षों में दिखने लगा. पुराने पेड़ों में फिर से फल आने लगे और उत्पादन बढ़ गया. इससे किसानों की कमाई में बड़ा बदलाव आया. आज मुजफ्फरपुर की लीची बिहार की पहचान बन चुकी है और इसके पीछे डॉ. त्रिवेदी की मेहनत को सबसे बड़ा कारण माना जाता है.
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जलजमाव वाली जमीन को बनाया कमाई का जरिया
उत्तर बिहार के कई इलाके हर साल बाढ़ और जलजमाव की समस्या से परेशान रहते थे. ऐसी जमीन पर खेती करना मुश्किल माना जाता था. लेकिन डॉ. त्रिवेदी ने इसी समस्या को किसानों के लिए कमाई का जरिया बना दिया. उन्होंने किसानों को मखाना, सिंघाड़ा और मछली पालन आधारित खेती के लिए प्रेरित किया. धीरे-धीरे किसानों ने इस खेती को अपनाना शुरू किया और अच्छी आय कमाने लगे. आज बिहार का मखाना देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी मशहूर हो चुका है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर डॉ. त्रिवेदी जैसे वैज्ञानिक किसानों को नई दिशा नहीं देते, तो शायद यह बदलाव इतना बड़ा नहीं होता.
शीतकालीन मक्का खेती से किसानों को मिला नया लाभ
डॉ. त्रिवेदी ने बिहार में शीतकालीन मक्का की खेती को बढ़ावा देने में भी अहम भूमिका निभाई. उन्होंने किसानों को बेहतर बीज, नई तकनीक और वैज्ञानिक खेती के तरीके अपनाने के लिए प्रेरित किया. उनके प्रयासों का असर यह हुआ कि बिहार आज देश के बड़े मक्का उत्पादक राज्यों में गिना जाता है. किसानों की लागत कम हुई और उत्पादन बढ़ा. इससे गांवों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई. उन्होंने हमेशा कहा कि खेती को विज्ञान से जोड़ना जरूरी है, तभी किसान आगे बढ़ पाएंगे.
किसानों के बीच रहकर किया काम
डॉ. गोपालजी त्रिवेदी सिर्फ विश्वविद्यालयों और प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहे. वे गांव-गांव जाकर किसानों से मिलते थे और उनकी समस्याओं का समाधान खोजते थे. सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने आराम नहीं किया और बिहार एक्वाकल्चर बेस्ड एग्रीकल्चर (BABA) संस्था के जरिए किसानों के साथ काम करते रहे. वे किसानों के बीच किसान मित्र और गांव पुरुष के नाम से पहचाने जाने लगे थे. 12 मई 2026 में उनका निधन हो गया, जिससे कृषि और शिक्षा जगत में शोक की लहर दौड़ गई. हालांकि आज भी बिहार के किसान उनके कामों को याद करते हैं. पद्मश्री सम्मान को सिर्फ उनकी उपलब्धि नहीं, बल्कि बिहार की खेती और किसानों की मेहनत का सम्मान माना जा रहा है.