भारत का नैनो डीएपी अब विदेशों में भी छाया, किसानों के लिए खुलेंगे खेती के नए अवसर

भारत में तैयार नैनो उर्वरकों को अब विदेशों में भी पहचान मिलने लगी है. इफको का नैनो डीएपी कोलंबिया में पंजीकृत हुआ है. विशेषज्ञों के अनुसार, नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के उपयोग से खाद की खपत कम हो सकती है और फसलों की पैदावार बढ़ाने में किसानों को बड़ा फायदा मिल सकता है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 7 May, 2026 | 06:44 PM

Fertilizer Technology: भारत में तैयार किए गए नैनो उर्वरक अब दुनिया के दूसरे देशों में भी तेजी से पहचान बना रहे हैं. इफको का नैनो डीएपी अब रिपब्लिक ऑफ कोलंबिया में सफलतापूर्वक पंजीकृत हो गया है. इसे भारतीय कृषि और सहकारी क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. इस सफलता से भारत की नई कृषि तकनीक को वैश्विक स्तर पर मजबूती मिली है और किसानों के लिए आधुनिक खेती के नए रास्ते खुले हैं. इफको (IFFCO) के अध्यक्ष दिलीप संघाणी ने बताया कि ये उपलब्धि केवल इफको की नहीं, बल्कि भारत के किसानों, वैज्ञानिकों और सहकारी मॉडल की सफलता है. आधुनिक तकनीक और किसान हित को ध्यान में रखते हुए लगातार नए प्रयोग किए जा रहे हैं, जिससे खेती को आसान और कम खर्च वाला बनाया जा सके.

डेढ़ साल की मेहनत के बाद मिली बड़ी सफलता

दिलीप संघाणी के अनुसार, कोलंबिया में पहले नैनो उर्वरकों  के लिए कोई तय नियम या प्रोटोकॉल मौजूद नहीं था. ऐसे में वहां नैनो डीएपी को मंजूरी दिलाना आसान नहीं था. लगभग डेढ़ साल तक लगातार बातचीत, परीक्षण और तकनीकी प्रक्रिया पूरी करने के बाद वहां नैनो उर्वरकों के लिए नए नियम तैयार किए गए. इसके बाद ही इफको के नैनो डीएपी को पंजीकरण मिल पाया. इसे भारत की कृषि तकनीक की बड़ी जीत माना जा रहा है. इससे यह साबित होता है कि भारतीय तकनीक अब दूसरे देशों का भरोसा भी जीत रही है. इफको का कहना है कि आने वाले समय में दूसरे देशों में भी भारतीय नैनो उर्वरकों की मांग बढ़ सकती है. इससे भारतीय कृषि क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी.

क्या होते हैं नैनो उर्वरक और कैसे करते हैं काम

नैनो उर्वरक नई तकनीक से तैयार किए गए आधुनिक खाद हैं. इनमें पोषक तत्व  बहुत छोटे कणों में होते हैं, जिससे पौधे उन्हें तेजी से अवशोषित कर लेते हैं. इससे फसलों को सही मात्रा में पोषण मिलता है और खाद की बर्बादी कम होती है. नैनो यूरिया और नैनो डीएपी किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. इन्हें स्प्रे के रूप में फसलों पर इस्तेमाल किया जाता है. कम मात्रा में उपयोग करने के बावजूद ये अच्छे परिणाम देने में मदद करते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, नैनो उर्वरकों के इस्तेमाल से मिट्टी पर कम दबाव पड़ता है और पर्यावरण को भी कम नुकसान होता है. यही कारण है कि अब किसान धीरे-धीरे पारंपरिक खाद से आधुनिक नैनो उर्वरकों की तरफ बढ़ रहे हैं.

किसानों को कैसे होगा फायदा

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद  और कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा किए गए परीक्षणों में नैनो उर्वरकों के अच्छे परिणाम सामने आए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, नैनो यूरिया के उपयोग से सामान्य यूरिया की जरूरत 25 से 50 प्रतिशत तक कम हो सकती है. इसके बावजूद फसलों की पैदावार अच्छी बनी रहती है. कई फसलों में उत्पादन 3 से 8 प्रतिशत तक बढ़ने की जानकारी भी मिली है. इससे किसानों का खाद पर खर्च कम हो सकता है और मुनाफा बढ़ सकता है. इसी तरह नैनो डीएपी के इस्तेमाल से फॉस्फोरस उर्वरकों की जरूरत भी कम होती है. कुछ फसलों में सामान्य डीएपी की आधी मात्रा कम करने के बाद भी अच्छा उत्पादन मिला है. इससे खेती की लागत घटाने में मदद मिल सकती है.

देश में तेजी से बढ़ रही नैनो उर्वरकों की मांग

केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, नैनो उर्वरकों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है. अब तक 500 मिलीलीटर की करोड़ों बोतलों की बिक्री हो चुकी है. इसमें नैनो यूरिया  और नैनो डीएपी दोनों की मांग तेजी से बढ़ी है. कई राज्यों के किसान अब इन उर्वरकों को अपनाने लगे हैं. कम लागत, आसान उपयोग और बेहतर परिणाम के कारण इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. इफको के अध्यक्ष दिलीप संघाणी के अनुसार, आधुनिक तकनीक और सहकारिता के जरिए किसानों को मजबूत बनाना ही सबसे बड़ा लक्ष्य है. उनका कहना है कि आने वाले समय में नैनो उर्वरक खेती को अधिक लाभकारी और पर्यावरण के लिए सुरक्षित बनाने में बड़ी भूमिका निभाएंगे.

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Published: 7 May, 2026 | 06:44 PM
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