खेती का खेल बदल रही कुंदरू… एक फसल, सालभर पैदावार और होगी लाखों की कमाई
कुंदरू की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे एक बार लगाने के बाद दो से तीन साल तक लगातार तोड़ाई की जा सकती है. यानी हर साल दोबारा बीज बोने का झंझट नहीं. किसान बताते हैं कि यह फसल 12 महीने उत्पादन देती है, जिससे आमदनी का सिलसिला रुके बिना चलता रहता है.
kundru farming: खेती अब सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं रही, बल्कि समझदारी से की जाए तो यह अच्छी आमदनी और स्थायी रोजगार का जरिया भी बन सकती है. ऐसी ही एक फसल है कुंदरू, जो कम खर्च में लंबी अवधि तक उत्पादन देकर किसानों की आय को लगातार बढ़ाती रहती है. गांवों में इसे कई नामों से जाना जाता है और शहरों में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है. स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिहाज से भी कुंदरू की सब्जी पसंद की जाती है, इसी वजह से बाजार में इसकी कीमत सालभर बनी रहती है.
क्यों खास है कुंदरू की खेती
कुंदरू की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे एक बार लगाने के बाद दो से तीन साल तक लगातार तोड़ाई की जा सकती है. यानी हर साल दोबारा बीज बोने का झंझट नहीं. किसान बताते हैं कि यह फसल 12 महीने उत्पादन देती है, जिससे आमदनी का सिलसिला रुके बिना चलता रहता है. सब्जी मंडियों, होटलों और शहरों में इसकी मांग बनी रहती है, इसलिए दाम गिरने का जोखिम भी कम होता है.
कमाई का गणित समझिए
कुंदरू की खेती करने वाले किसानों का कहना है कि अगर बाजार में भाव 30 से 40 रुपये प्रति किलो भी रहे, तो एक एकड़ से दो से तीन लाख रुपये तक की कमाई आसानी से हो जाती है. अच्छी देखभाल और बेहतर गुणवत्ता के साथ यही कमाई बढ़कर पांच लाख रुपये तक भी पहुंच सकती है. खास बात यह है कि एक एकड़ खेत से हर हफ्ते तीन से चार क्विंटल तक तुड़ाई मिल जाती है, जिससे नियमित नकद आय बनी रहती है.
खर्च की बात करें तो खेत की तैयारी, बीज या कलम, खाद, सिंचाई और देखभाल मिलाकर लगभग 60 से 70 हजार रुपये तक का खर्च आता है. अगर किसान पारंपरिक तरीकों और गोबर खाद का इस्तेमाल करें, तो लागत और भी कम हो सकती है.
खेत की तैयारी और रोपाई
कुंदरू की खेती के लिए उपजाऊ और जल निकासी वाली मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है. खेत को अच्छी तरह जोतकर मिट्टी को भुरभुरा बनाना जरूरी है. इसके बाद चार फीट की दूरी पर बेड तैयार किए जाते हैं और करीब तीन फीट की दूरी पर पौधे लगाए जाते हैं. बेल वाली फसल होने के कारण इसे सहारे की जरूरत होती है. लकड़ी या तार का सहारा देने से फल जमीन से ऊपर रहते हैं, जिससे गुणवत्ता बेहतर होती है और सड़न का खतरा कम होता है.
सिंचाई और देखभाल
कुंदरू को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन नमी बनी रहनी चाहिए. ड्रिप सिंचाई अपनाने से पानी की बचत होती है और पौधों को जरूरत के मुताबिक नमी मिलती रहती है. समय-समय पर निराई-गुड़ाई करते रहने से खरपतवार नहीं उगते और पौधों की बढ़वार अच्छी रहती है. जैविक खाद और गोबर की खाद से उत्पादन बढ़ता है और सब्जी की गुणवत्ता भी बेहतर होती है.
रोग-कीट से बचाव
अगर फसल में रोग या कीट का हमला दिखे, तो समय रहते जैविक या संतुलित दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए. किसानों का अनुभव है कि सही समय पर देखभाल करने से उत्पादन में गिरावट नहीं आती और बेल लंबे समय तक फल देती रहती है.
कुंदरू की खेती का सही समय
कुंदरू की खेती साल में कई बार की जा सकती है. बरसात के मौसम यानी जुलाई-अगस्त को इसका सबसे अच्छा समय माना जाता है. इसके अलावा सितंबर-अक्टूबर में कलम से रोपाई कर पौधे तैयार किए जा सकते हैं. गर्मियों में मार्च से मई के बीच भी इसकी खेती संभव है, बस सिंचाई का ध्यान रखना जरूरी होता है.
किसानों के लिए फायदे का सौदा
कुंदरू की खेती उन किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है, जो कम लागत में सालभर नियमित कमाई चाहते हैं. थोड़ी मेहनत, सही तकनीक और बाजार की समझ के साथ यह फसल किसानों को लखपति बनने की राह दिखा सकती है. यही वजह है कि आज कई किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ कुंदरू की खेती को अपनाकर अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं.