Opinion: ग्रामीण पलायन का रास्ता हुआ संकरा, फिर भी नहीं पट रही गांव और शहर की खाई 

सरकारें भले ही गांवों में कौशल विकास के कितने भी दावे कर लें, लेकिन सच्चाई यह है कि ज्यादातर कौशल केंद्र शहरों में ही संचालित हो रहे हैं. इतना ही नहीं, गांव से शहर की ओर हो रहे पलायन की अन्य वजहों में शुमार अच्छे स्कूल और अस्पताल जैसी बुनियादी जरूरतें अभी भी गांवों से दूर ही हैं.

निर्मल यादव
झांसी | Updated On: 4 Feb, 2026 | 02:45 PM

आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट पेश करने से पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने समाप्त होने जा रहे चालू वित्तीय वर्ष 2025-26 का आर्थिक सर्वेक्षण पेश कर दिया है. अर्थव्यवस्था की नब्ज को टटोलने वाले इस सर्वे में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए किए जा रहे उपायों का परिणाम अब मिलना प्रारंभ होने के संकेत दिए गए हैं. इसमें गांव से शहर की ओर हो रहे बेतहाशा पलायन की गति पर कुछ लगाम लगने का उल्लेखनीय संकेत मिलता है. हालांकि आर्थिक सर्वेक्षण में यह बात भी स्पष्ट होती है कि ढांचागत विकास और मूलभूत सुविधाओं के लिहाज से गांव और शहर के बीच की खाई अभी भी पर्याप्त चौडी है, इस दरार को पाटने में अभी लंबा सफर तय करना है.

युवा शहर जाने की राह देखने को मजबूर

देश की दो तिहाई आबादी अब भी गांवों में रहती है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में इस मानव संसाधन का यथोचित उपयोग नहीं हो पा रहा था. इस  चिंता के निवारण के लिए ही सरकार ने ग्रामीण इलाकों में ढांचागत विकास की प्रक्रिया को तेज करते हुए आजीविका के साधन गांव में ही मुहैया कराने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन भी चलाया है. इसकी मदद से ग्रामीण आबादी का शहरों में हो रहे पलायन को रोकने की कोशिश की जा रही है. इसकी गति की समीक्षा करते हुए आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि गांव की युवा आबादी आजीविका की तलाश और बेहतर जीवन स्तर हासिल करने के मकसद से शहरों की तरफ शहर जाने की राह देखने को मजबूर हैं. हालांकि बीते कुछ सालों में सरकारी प्रयासों के फलस्वरूप पलायन की बाट जोह रहे ग्रामीणों के लिए अब शहर जाने का रास्ता संकरा हुआ है. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक गांव से युवाओं के शहरों की ओर हो रहा पलायन, बुजुर्गों को बेसहारा बनाने के लिए अभिशप्त कर रहा है. आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि इस पलायन को रोकने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जीवंत करने के उपायों की गति को तेज करना ही एकमात्र उपाय है.

शहर में रहने को सफलता मानने की धारणा भी पलायन बढ़ा रही

इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, “शहर और शहरों के आसपास के क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, नागरिक सेवाएं, मनोरंजन के बेहतर विकल्प ग्रामीण आबादी को उम्दा जीवन स्तर की आस में शहरों की ओर आकर्षित करते हैं. इसके अलावा शहर में रहने को सफलता का प्रतीक मानने की सामाजिक धारणा भी पलायन को बढावा दे रही है. इन सभी कारणों से बीते कुछ दशकों में हुए बेतहाशा पलायन के फलस्वरूप शहर अब प्रवासी आबादी के बोझ तले दब गए है. यह स्थिति आबादी के बोझ को सहने की सीमा से आगे जाते हुई दिख रही है. सरकार के लिए संतोष की बात सिर्फ इतनी सी है कि लगातार हो रहे पलायन के बावजूद देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी अभी भी गांवों में ही रहती है. इस मानव संसाधन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए इस्तेमाल करने पर सरकार का जोर है. हालांकि वर्तमान ग्रामीण आबादी में बुजुर्गों का अनुपात ज्यादा है. इसका सामाजिक दुष्प्रभाव यह है कि जब गांव के युवा काम की तलाश में शहरों की ओर जाते हैं तो बुजुर्गों सहारा कम हो जाता है. इससे गांव में रह रहे बुजुर्गों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है.

नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने का दबाव बहुत ज्यादा

ग्रामीण पलायन को लेकर जानकारों का मानना है कि शहरों पर लगातार बढ़ती आबादी को समानुपातिक रूप से नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने का दबाव बहुत ज्यादा है. यह बात भी सही है कि ग्रामीण पलायन को रोक पाना अब सरकारों के लिए असंभव सा है. गांवों में बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय जैसी मौलिक सहूलियतों का दशकों से अभाव है. इतनी जल्दी इस खाई को पाटने में सरकारों का असहाय होना अचरज की बात नहीं है. समस्या का एक पहलू यह भी है कि गांवों में आजीविका मूलभूत साधन खेती है और किसानों की आबादी में दो तिहाई से ज्यादा हिस्सेदारी रखने वाले छोटे किसानों के लिए खेती किसानी अब लगभग मृतप्राय हो चुकी है.

खेती के जरिए किसानों के लिए आजीविका चलाना बेहद कठिन

खेती के जरिए लघु एवं सीमांत किसानों के लिए आजीविका चलाना नामुमकिन सा है. औसतन प्रत्येक ग्रामीण परिवार का कोई परिजन शहरी जीवन जरूर जी रहा है. ऐसे में प्रत्येक ग्रामीण परिवार शहर और गांव में होने वाली आय के स्तर में भारी अंतर से भी वाकिफ है. इसीलिए शहरों में बेहतर आय की आस उन्हें गांव में बेहतर आजीविका के प्रति नाउम्मीद बनाती है. सरकार इस व्यवहारिक सच से दूर कतई नहीं है कि इन सभी कारणों से ग्रामीण पलायन को रोकना आसान नहीं है.

इसके मद्देनजर ही आर्थिक सर्वेक्षण में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए समावेशी ग्रामीण विकास की बात की गई है. इसके लिए बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मौलिक सहूलियतें देने, उद्यमिता और नवाचार से गांवों को जोड कर ग्रामीण जीवन को सहज और सुलभ बनाने पर जोर दिया जा रहा है. इस मकसद को पाने में दीनदयाल अंत्योदय योजना के तहत राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन पर सरकार को पूरा भरोसा है. इसके तहत दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना भी चल रही है. यह राज्य-निर्मित योजना के तहत कौशल विकास और प्लेसमेंट की पहल है. इसे सरकारी और निजी क्षेत्र की भागीदारी से संचालित किया जा रहा है. यह योजना पहले से संचालित हो रही कौशल प्रशिक्षण योजनाओं से अलग है, क्योंकि यह आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीण युवाओं पर केंद्रित है. इसमें स्थायी रोजगार सुनिश्चित करने के लिए पोस्ट-प्लेसमेंट ट्रैकिंग पर जोर दिया जाता है.

कौशल विकास का बुनियादी ढांचे से कितने बदलेंगे हालात

इसके अलावा आर्थिक सर्वेक्षण में ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान कार्यक्रम के तहत देश के प्रत्येक जिले में कौशल विकास का बुनियादी ढांचा तैयार करने की बात भी कही गई है. इस कार्यक्रम का मकसद विशेष रूप से गरीबी रेखा से नीचे और अंत्योदय योजना से जुड़े परिवारों के ग्रामीण युवाओं का कौशल विकास करना है. जिससे उन्हें उद्यमिता विकास के लिए तैयार किया जा सके. इसके तहत देश के 616 जिलों में 629 संस्थान संचालित हैं. इन संस्थानों को 25 वित्तीय संस्थान सपोर्ट करते हैं, जिन्हें कौशल विकास और आजीविका संवर्धन केंद्रों के माध्यम से चलाया जा रहा है.

कुल मिलाकर आर्थिक सर्वेक्षण या अन्य रिपोर्टों के माध्यम से सरकारें, भले ही गांवों में कौशल विकास के कितने भी दावे कर लें, लेकिन सच्चाई यह है कि ज्यादातर कौशल केंद्र शहरों में ही संचालित हो रहे हैं. इतना ही नहीं, गांव से शहर की ओर हो रहे पलायन की अन्य वजहों में शुमार अच्छे स्कूल और अस्पताल जैसी बुनियादी जरूरतें अभी भी गांवों से दूर ही हैं. सरकारी फाइलों में उकेरी गई गांवों की तस्वीर का स्याह सच सत्तापक्ष के विधायकों द्वारा अपनी ही सरकार के मंत्रियों का रास्ता रोककर सूखी पड़ी पानी की पाइपलाइनें और गड्ढा युक्त सड़कें दिखाने की घटनाएं उजागर कर देती हैं.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

Published: 4 Feb, 2026 | 02:42 PM

केला जल्दी काला क्यों पड़ जाता है?