Birthday Special: किसान के घर जन्मे शिवराज कैसे बने करोड़ों दिलों के ‘मामा’? जानिए उनका पूरा सफर

5 मार्च 1959 को जन्मे शिवराज सिंह चौहान आज अपना 67वां जन्मदिन मना रहे हैं. गांव के माहौल में पले-बढ़े शिवराज ने बचपन से ही किसानों की समस्याओं और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को करीब से देखा. यही अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीति की दिशा तय करने में अहम साबित हुआ.

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नई दिल्ली | Updated On: 5 Mar, 2026 | 10:35 AM

देश की राजनीति में एक ऐसा नाम है जिसे लोग सिर्फ नेता के रूप में नहीं बल्कि अपने परिवार के सदस्य की तरह देखते हैं. वह नाम है शिवराज सिंह चौहान. 5 मार्च 1959 को जन्मे शिवराज सिंह चौहान आज अपना 67वां जन्मदिन मना रहे हैं.

एक साधारण किसान परिवार में जन्मे शिवराज का सफर संघर्ष, मेहनत और जनता से गहरे जुड़ाव की कहानी है. गांव की मिट्टी से उठकर देश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाने तक उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन हमेशा अपनी सादगी और जनसेवा की भावना को बरकरार रखा.

आज वे देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और केंद्र सरकार में कृषि एवं ग्रामीण विकास से जुड़े अहम दायित्व देख रहे हैं. किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास पर उनका विशेष फोकस हमेशा से रहा है. आज उनके जन्मदिन के मौके पर जानिए कैसे वह देश के करोड़ों लोगों के लिए उनके मामा बन गए.

किसान परिवार में जन्म, बचपन से ही सामाजिक सोच

शिवराज सिंह चौहान का जन्म मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के जैत गांव में हुआ था. यह गांव नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ है. उनके पिता प्रेम सिंह चौहान किसान थे और माता सुंदर बाई चौहान एक सरल और संस्कारी महिला थीं. गांव के माहौल में पले-बढ़े शिवराज ने बचपन से ही किसानों की समस्याओं और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को करीब से देखा. यही अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीति की दिशा तय करने में अहम साबित हुआ. उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई गांव में की और बाद में उच्च शिक्षा के लिए भोपाल पहुंचे. उन्होंने बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के हमीदिया कॉलेज से दर्शनशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन किया और गोल्ड मेडल हासिल किया.

छात्र राजनीति से शुरू हुआ सार्वजनिक जीवन

शिवराज सिंह चौहान का राजनीतिक सफर छात्र जीवन से ही शुरू हो गया था. स्कूल के दिनों में उन्होंने छात्र संघ के चुनाव में हिस्सा लिया. 10वीं कक्षा में उन्होंने स्टूडेंट कैबिनेट के सांस्कृतिक सचिव का चुनाव लड़ा, हालांकि उस समय जीत नहीं मिली. लेकिन अगले ही साल उन्होंने छात्र संघ के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा और जीत हासिल की.

साल 1975 में वे छात्र संघ के अध्यक्ष बने, उसी समय देश में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर चल रहा था. आपातकाल के समय उन्होंने इसका विरोध किया और इस दौरान 1976-77 में जेल भी गए. इतना ही नहीं महज 13 साल की उम्र में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से भी जुड़ गए थे, जिसने उनके विचार और नेतृत्व क्षमता को मजबूत किया.

संघर्ष से बना राजनीतिक कद

शिवराज सिंह चौहान का राजनीतिक सफर आसान नहीं था. शुरुआत में उनके परिवार वाले भी नहीं चाहते थे कि वे राजनीति में जाएं. लेकिन उन्होंने अपने फैसले पर अडिग रहते हुए मजदूरों के हक में आंदोलन शुरू किया. यह उनका पहला बड़ा आंदोलन था, जिसमें उन्होंने मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने की मांग की और सफलता भी हासिल की.

धीरे-धीरे वे संगठन में सक्रिय होते गए और भाजपा के युवा नेताओं में गिने जाने लगे. साल 1988 में वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बने. इसी दौरान भोपाल में आयोजित एक बड़े मशाल जुलूस में उन्होंने हजारों किसानों को जुटाकर अपनी नेतृत्व क्षमता साबित की. बताया जाता है कि उस समय राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने उनके नेतृत्व से प्रभावित होकर कहा था कि यह युवा नेता आगे चलकर देश की राजनीति में बड़ा नाम बनाएगा.

पांच बार सांसद बनने का रिकॉर्ड

शिवराज सिंह चौहान ने संसद में भी लंबा अनुभव हासिल किया. वे विदिशा लोकसभा सीट से पांच बार सांसद चुने गए. पहली बार वे 10वीं लोकसभा के लिए सांसद बने. इसके बाद उन्होंने लगातार कई चुनाव जीतकर अपनी लोकप्रियता साबित की. उनका संसदीय अनुभव ही आगे चलकर उन्हें प्रदेश की राजनीति में बड़ी जिम्मेदारी तक ले गया.

सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड

साल 2005 शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. 29 नवंबर 2005 को जब तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने इस्तीफा दिया तो शिवराज सिंह चौहान को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया. उस समय वे राज्य के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्रियों में शामिल थे. इसके बाद उन्होंने कई सालों तक प्रदेश का नेतृत्व किया और मध्य प्रदेश के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया. वह 2023 तक मुख्यमंत्री की भूमिका में रहे. उनके कार्यकाल में कई योजनाएं शुरू की गईं, जिनका उद्देश्य ग्रामीण विकास, शिक्षा और महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा देना था.

‘मामा’ कैसे बने शिवराज सिंह चौहान

मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को लोग प्यार से ‘मामा’ कहते हैं. यह संबोधन सिर्फ राजनीतिक पहचान नहीं बल्कि भावनात्मक रिश्ता बन चुका है. दरअसल, उनके मुख्यमंत्री रहते हुए बेटियों और महिलाओं के लिए कई योजनाएं शुरू की गईं. इनमें लाड़ली लक्ष्मी योजना सबसे लोकप्रिय रही. इस योजना के तहत बेटियों की शिक्षा और भविष्य के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है. इसके अलावा मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के जरिए गरीब परिवारों की बेटियों की शादी में आर्थिक मदद दी गई. इन्हीं योजनाओं के कारण प्रदेश की बेटियों ने उन्हें प्यार से ‘मामा’ कहना शुरू किया और धीरे-धीरे यह नाम पूरे प्रदेश और देश में उनकी पहचान बन गया.

निजी जीवन की दिलचस्प कहानी

शिवराज सिंह चौहान की निजी जिंदगी भी काफी दिलचस्प रही है. बताया जाता है कि उन्होंने शुरुआत में शादी न करने का फैसला किया था. लेकिन बाद में उनकी मुलाकात साधना सिंह से हुई और दोनों के बीच प्रेम हुआ. उन्होंने अपने प्रेम का इजहार चिट्ठी लिखकर किया था. 6 मई 1992 को दोनों ने विवाह किया. आज उनके दो बेटे हैं और परिवार उनके राजनीतिक जीवन में हमेशा सहारा बना रहा है. शिवराज कई बार कह चुके हैं कि उनकी सफलता में उनकी पत्नी साधना सिंह का बड़ा योगदान है.

किसानों और गांवों पर विशेष ध्यान

किसान परिवार से आने के कारण शिवराज सिंह चौहान हमेशा किसानों और ग्रामीण विकास से जुड़े मुद्दों पर विशेष ध्यान देते रहे हैं. मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने किसानों के लिए कई योजनाएं लागू कीं और कृषि क्षेत्र को मजबूत करने की कोशिश की. आज भी उनकी पहचान ऐसे नेता के रूप में होती है जो गांव, किसान और गरीबों की समस्याओं को समझते हैं.

जनता से जुड़ाव ही सबसे बड़ी ताकत

शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह उनका जनता से सीधा जुड़ाव माना जाता है. गांव की चौपाल से लेकर बड़े राजनीतिक मंच तक वे हमेशा सहज और सरल अंदाज में लोगों से संवाद करते हैं. यही कारण है कि लोग उन्हें सिर्फ नेता नहीं बल्कि अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं.

किसान परिवार में जन्मा वह बालक आज करोड़ों लोगों के भरोसे का प्रतीक बन चुका है और उनका यह सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा की कहानी बन गया है.

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Published: 5 Mar, 2026 | 10:27 AM

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