Bihar politics: सम्राट चौधरी बिहार के अगले मुख्यमंत्री होंगे. उन्हें NDA विधायक दल का नेता चुन लिया गया है. 15 अप्रैल को वे लोकभवन में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. हालांकि, सम्राट चौधरी के विधायक दल के नेता चुने जाने से पहले मुख्यमंत्री पद के लिए मीडिया में कई नाम पर चर्चा चल रही थी. केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय, डिप्टी सीएम विजय सिन्हा और खेल मंत्री श्रीयसी सिंह का नाम भी सीएम पद की रेस में प्रमुखता से लिया जा रहा था. लेकिन सम्राट चौधरी को एनडीए विधायक दल का नेता चुनने के बाद सब अटकलें खत्म हो गईं. तो आइए जानते हैं, बीजेपी ने आखिर मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी के ऊपर अपना विश्वास क्यों जताया.
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के बाद सम्राट चौधरी देश के पहले ऐसे नेता हैं, जिन्होंने बीजेपी में आने के बाद कम समय में बहुत तेजी से तरक्की की .2018 में बीजेपी में शामिल होने के बाद सम्राट चौधरी का पार्टी में प्रभाव लगातार बढ़ता गया. अब वे मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. दरअसल, बीजेपी ने सम्राट चौधरी को आगे करके जातीय समीकरण को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है. पार्टी बिहार में नीतीश कुमार की जगह एक मजबूत ओबीसी नेता को सामने लाना चाहती थी. सम्राट चौधरी कुशवाहा (कोईरी) समाज से आते हैं, जबकि नीतीश कुमार कुर्मी समाज से हैं. बिहार की राजनीति में कुर्मी और कुशवाहा मिलकर ‘लव-कुश’ समीकरण बनाते हैं, जो एक बड़ा वोट बैंक माना जाता है. इसी को ध्यान में रखते हुए माना जाता है कि बीजेपी ने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री चेहरा बनाकर इस वोट बैंक को साधने की रणनीति अपनाई है. बिहार की राजनीति में कुर्मी और कुशवाहा समाज को मिलाकर लगभग 7 प्रतिशत वोट बैंक है, जो 50 से 60 विधानसभा सीटों पर असर डाल सकता है. सम्राट चौधरी खुद कुशवाहा समाज से आते हैं. इसी वजह से माना जाता है कि बीजेपी ने उन्हें आगे करके इस मजबूत वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की रणनीति बनाई है.
नीतीश कुमार का भरोसा जीतना भी रहा एक फैक्टर
नीतीश कुमार का भरोसा जीतना भी सम्राट चौधरी के लिए फायदेमंद साबित हुआ. एक समय वे नीतीश कुमार के खिलाफ खुलकर बयान देते थे और उन्होंने पगड़ी न खोलने की कसम तक खाई थी. लेकिन बाद में उन्होंने नीतीश कुमार को अपना अभिभावक बताया और उनके साथ नजदीकी बढ़ाई. नीतीश कुमार जहां-जहां गए, सम्राट चौधरी भी उनके साथ दिखाई दिए, जिससे दोनों के रिश्ते बेहतर हुए और भरोसा मजबूत हुआ. वहीं, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी ने सम्राट चौधरी को आगे लाने का फैसला सोच-समझकर किया है. उनके जरिए पार्टी ने जातीय संतुलन, संगठन का अनुभव और गठबंधन की मजबूती– तीनों पहलुओं को साधने की कोशिश की है. माना जा रहा है कि इससे बिहार की राजनीति में बीजेपी के नेतृत्व में एक नई दिशा शुरू हो सकती है.
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सम्राट चौधरी का सियासी सफर
53 वर्षीय सम्राट चौधरी युवा नेता होने के साथ-साथ लंबी राजनीति का अनुभव रखते हैं. वे शकुनी चौधरी के बेटे हैं, जो समता पार्टी के संस्थापकों में से एक रहे हैं. शकुनी चौधरी कुशवाहा समाज के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं और वे बिहार में कई बार विधायक और सांसद और मंत्री रह चुके हैं. ऐसे में सम्राट चौधरी ने अपने पिता के राजनीतिक प्रभाव के सहारे ही राजनीति में कदम रखा और आगे बढ़ते गए.
1999 में पहली बार बने मंत्री
सम्राट चौधरी ने 1990 के दशक में आरजेडी से अपनी राजनीतिक शुरुआत की थी. वे बहुत कम उम्र में, करीब 19 साल की उम्र में मंत्री बने थे. 1999 में राबड़ी देवी की सरकार में वे सबसे युवा मंत्रियों में से एक थे. उस समय उनके मंत्री बनने को लेकर उनकी उम्र पर विवाद भी हुआ और बाद में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद उन्होंने आरजेडी छोड़ी और जेडीयू में शामिल हो गए. 2014 में जब जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने, तब उनकी सरकार में सम्राट चौधरी कैबिनेट मंत्री बने. लेकिन जब नीतीश कुमार दोबारा मुख्यमंत्री बने, तो उन्हें कैबिनेट में जगह नहीं मिली. इससे वे जेडीयू से असंतुष्ट हो गए और पार्टी छोड़ दी.
2018 में बीजेपी जॉइन की
इसके बाद 2018 में उन्होंने बीजेपी जॉइन कर ली. हालांकि उन्होंने कई दलों में काम किया, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा राजनीतिक पहचान और मजबूती बीजेपी में ही मिली. 2019 में नित्यानंद राय के प्रदेश अध्यक्ष रहते उन्हें बीजेपी का उपाध्यक्ष बनाया गया और धीरे-धीरे वे पार्टी में एक महत्वपूर्ण नेता बन गए. फिर वे बिहार बीजेपी के अध्यक्ष बने. साल 2025 में उन्हें डिप्टी सीएम बनाया गया. अब वे मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं.