बत्तख पालन के लिए ये खास नस्ल किसानों के लिए क्यों है फायदेमंद, जानें
मौजूदा समय में किसान ज्यादा मुनाफे के लिए अब पशुपालन की तरफ भी देखने लगे हैं. बत्तख पालन, अब उनका फेवरिट हो चुका है. आज हम आपको बत्तख की एक ऐसी किस्म के बारे में बताते हैं जो किसानों के लिए फायदेमंद हो सकती है.

खाकी कैंपबेल वह नस्ल है जो इस समय भारत के किसानों के बीच काफी पॉपुलर है. इस नस्ल को अंडों के उत्पादन की वजह से काफी पसंद किया जाता है.

यह नस्ल अंडों के बेहतरीन उत्पादन के लिए जानी जाती है. साथ ही यह किसानों के लिए आय का अच्छा स्रोत बन सकता है.

खाकी कैंपवेल बत्तख एक साल में 250 से 350 अंडे दे सकती है और यह बाकी नस्लों की तुलना में कहीं ज्यादा है. साथ ही इसके अंडे मुर्गी के अंडों की तुलना में 15 से 20 ग्राम बड़े होते हैं और साथ ही कई पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं.

इनकी पहचान करना भी काफी आसान है. नर बत्तख की पीठ के निचले हिस्से का रंग भूरा होता है, जबकि उसकी चोंच हरे रंग की, टांगे और पंजे गहरे संतरी रंग के होते हैं.

वहीं मादा बत्तख का सिर और गर्दन भूरे रंग के होते हैं जबकि पंख खाकी रंग के होते हैं और टांगे और पंजे भूरे रंग के होते हैं.

नर बत्तख का वजन करीब 2.2 से 2.4 किलो जबकि मादा बत्तख 2.0 से 2.2 किलो के होते हैं. इसलिए मांस के लिए भी इन्हें बेहतरीन माना जाता है.

बाजार में इन अंडों की कीमत 10 से 12 रुपये प्रति अंडे तक होती है और ये किसानों के लिए इनकम का अच्छा स्रोत बन सकते हैं.

वहीं बतख की यह नस्ल काफी समझदार होती हैं और इन्हें किसी खास देखभाल की आवश्यकता नहीं होती है. यह किसी भी जलवायु परिस्थितियों में आसानी से ढल जाती है.

यह बतख इतनी तेज होती है कि अजनबी को देख शोर मचाने लगती है जिससे फॉर्म सुरक्षित रहता है. इसी कारण इसे 'किसानों का चौकीदार' भी कहते है.
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