पौष्टिक तत्वों से भरपूर है जलगांव का केला, 15 महीने में तैयार हो जाती है फसल.. विदेशों में भी भारी डिमांड
जलगांव महाराष्ट्र का प्रमुख केला उत्पादक केंद्र है. यहां 75,000 हेक्टेयर में GI प्रमाणित जलगांव केला उगता है. Grand Naine (G9) किस्म मीठा और पौष्टिक है. ड्रिप सिंचाई, काली मिट्टी और बेहतर मार्केट कनेक्टिविटी से उत्पादन बढ़ता है. यहां के किसान तूफान और मौसम चुनौतियों का सामना करते हैं.
Maharashtra News: महाराष्ट्र का नाम सुनते ही लोगों के जेहन में सबसे पहले प्याज और अंगूर की तस्वीर उभरकर सामने आती है. लोगों को लगता है कि यहां पर केवल प्याज और अंगूर की ही खेती होती है, लेकिन ऐसी बात नहीं है. यहां पर किसान बड़े स्तर पर केले की भी खेती करते हैं. यहां से केले की सप्लाई विदेशों तक में होती है. ऐसे तो पूरे महाराष्ट्र में किसान केले की खेती करते हैं, लेकिन जलगांव केले की बात ही अलग है. इसे अपनी गुणवत्ता के चलते जीआई टैग मिला हुआ है.
जलगांव केला को साल 2016 में GI टैग मिला है. यह महाराष्ट्र की एक खास और पौष्टिक केले की किस्म है. यह राज्य के कुल उत्पादन का लगभग दो-तिहाई हिस्सा देता है. जलागांव को ‘भारत का केला शहर’ कहा जाता है. ऐसे जलगांव दुनिया का सातवां सबसे बड़ा केला उत्पादक केंद्र है और यह भारत के कुल उत्पादन का 16 फीसदी हिस्सा देता है. यहां मुख्य रूप से ग्रैंड नाइन (G9) किस्म उगाई जाती है, जो मीठे, पौष्टिक और हरे-पीले रंग के लिए मशहूर है. कम वर्षा के कारण किसान उच्च घनत्व वाली खेती और बढ़ी हुई पैदावार के लिए 1989 से ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह केला न केवल स्वाद और गुणवत्ता में खास है, बल्कि दुबई जैसे देशों में इसके निर्यात से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है.
हर साल आंधी-तुफान से फसल हो जाती है बर्बाद
जलगांव में 75,000 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में केले की खेती होती है. लेकिन इन बागानों के पीछे किसानों की चिंता हमेशा बनी रहती है. फरवरी से जून तक हर साल तेज हवाएं और तूफान आते हैं, जो बागानों को नुकसान पहुंचाते हैं और किसानों की मेहनत को खतरे में डाल देते हैं. जून 2025 में रावेर, मुक्ताइनगर और चोपड़ा तालुकों में 3,000 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में तूफान और बारिश ने 30 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान किया और 93 गांवों के 1,500 से अधिक किसानों की आजीविका प्रभावित हुई. वर्षा, ओले और चक्रवात जैसी असामान्य मौसम स्थितियां हर साल करोड़ों का नुकसान कर देती हैं.
साल 2016 में जलगांव केला को मिला GI टैग
साल 2021 में जलगांव केला की 22 मीट्रिक टन की खेप दुबई निर्यात की गई थी. जलगांव केले को 2016 में GI प्रमाणन मिला था, जिसे निसर्गराज कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) जलगांव में पंजीकृत किया गया. भारत के केले का निर्यात तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि किसान अब वैश्विक मानकों के अनुसार खेती कर रहे हैं. 2018-19 में भारत ने 1.34 लाख मीट्रिक टन केले का निर्यात किया, जिसका मूल्य 413 करोड़ रुपये था. यह 2019-20 में बढ़कर 1.95 लाख मीट्रिक टन और 660 करोड़ रुपये हो गया. अप्रैल 2020 से फरवरी 2021 तक 1.91 लाख टन केले का निर्यात हुआ, जिसका मूल्य 619 करोड़ रुपये था. ऐसे भारत दुनिया का सबसे बड़ा केला उत्पादक देश है, जो कुल उत्पादन का लगभग 25 फीसदी हिस्सा देता है. आंध्र प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश देश के 70 फीसदी से अधिक केले का उत्पादन करते हैं.
केले की खेती के लिए सही तापमान क्या है
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, केला एक उष्णकटिबंधीय फल है जो सामान्य समशीतोष्ण और आर्द्र जलवायु में अच्छी तरह उगता है. इसके लिए 15 से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान आदर्श माना जाता है. सर्दियों में 12 डिग्री सेल्सियस से कम और गर्मियों में 40 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान फसल के लिए हानिकारक होता है. केले के पत्ते 44 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान पर पीले पड़ जाते हैं. गर्मियों की तेज हवाएं और सर्दियों की अत्यधिक ठंड फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं. हालांकि जलगांव की जलवायु आर्द्र नहीं है, फिर भी यहां के बड़े केले के बागों का कारण काली मिट्टी, अच्छी जल आपूर्ति और उत्तर भारत के बाजारों तक आसान पहुंच है, जो किसानों के लिए लाभदायक साबित होती है.
जलगांव जिले में मॉनसून शुरू होते ही केले की बुवाई का मौसम शुरू हो जाता है. इस समय क्षेत्र की जलवायु गर्म और आर्द्र होती है. जून- जुलाई में किए गए रोपण को कैलेंडर बैग कहते हैं, जबकि सितंबर-जनवरी में किए गए रोपण को कंडे बैग कहा जाता है. कैलेंडर रोपण फरवरी में अधिक उपज देता है और इसकी वजह से केले की कटाई 18 महीने की बजाय सिर्फ 15 महीने में की जा सकती है.
12 महीनों में नाइट्रोजन का सही इस्तेमाल बहुत जरूरी है
इस पेड़ की जड़ें उथली होती हैं और इसकी पोषण की जरूरत ज्यादा होती है. इसलिए, विकास के पहले 12 महीनों में नाइट्रोजन का सही इस्तेमाल बहुत जरूरी है. रोपण के बाद दूसरे, तीसरे और चौथे महीने में प्रति पौधे 200 ग्राम नाइट्रोजन तीन बराबर हिस्सों में डालें. हर पौधे पर एक बार में 500-700 ग्राम अरंडी का चूर्ण उर्वरक के साथ डालना चाहिए. रोपण के समय 400 ग्राम अमोनियम सल्फेट भी खाद के साथ दिया जाना चाहिए.
ट्रंक के पास पानी जमा नहीं होना चाहिए
केले के पौधे को बहुत पानी चाहिए, लेकिन ट्रंक के पास पानी जमा नहीं होना चाहिए. पत्तियों के बीच की दूरी मिट्टी और पौधों की उम्र के अनुसार तय की जाती है. उर्वर और गहरी मिट्टी में प्रति पौधे 7-10 सेंटीमीटर पानी पर्याप्त होता है. गर्मियों में हर 6-8 दिन, सर्दियों में 9-15 दिन में पानी देना चाहिए. बहुत गर्मी में 5-6 दिन बाद फिर से पानी देना जरूरी है. ऐसे में जलगांव में केले का वार्षिक उत्पादन लगभग 34 लाख टन है.
खबर से जुड़े जरूरी आंकड़े
- जलगांव केला को साल 2016 में मिला जीआई टैग
- 75,000 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में केले की खेती होती है
- 3,000 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में हर साल फसल हो जाती है बर्बाद
- अप्रैल 2020 से फरवरी 2021 तक 1.91 लाख टन केले का निर्यात हुआ
- फसल के लिए 15 से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान आदर्श माना जाता है
- जलगांव में केले का वार्षिक उत्पादन लगभग 34 लाख टन है