सावधान! 2026 में लौट सकता है खतरनाक सुपर एल नीनो, भारत के मानसून पर पड़ेगा गहरा असर

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार भूमध्यरेखीय और पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी तेजी से गर्म होने लगा है. यही वह क्षेत्र है जहां से अल नीनो की स्थिति विकसित होती है. समुद्र के तापमान में लगातार बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि आने वाले महीनों में मौसम में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 9 Mar, 2026 | 08:43 AM

El Nino 2026 forecast: दुनिया के मौसम को प्रभावित करने वाली बड़ी जलवायु घटना अल नीनो (El Niño) इस साल फिर से सक्रिय हो सकती है. यूरोप की प्रमुख मौसम एजेंसी यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-टर्म वेदर फोरकास्ट (ECMWF) के ताजा पूर्वानुमान के अनुसार प्रशांत महासागर में मई तक अल नीनो बनने के संकेत मिल रहे हैं और अगस्त तक यह और मजबूत हो सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार मध्यम से मजबूत अल नीनो बनने की संभावना काफी ज्यादा है, जबकि थोड़ी संभावना सुपर अल नीनो बनने की भी जताई जा रही है.

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार भूमध्यरेखीय और पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी तेजी से गर्म होने लगा है. यही वह क्षेत्र है जहां से अल नीनो की स्थिति विकसित होती है. समुद्र के तापमान में लगातार बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि आने वाले महीनों में मौसम में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

आंकड़ों में दिख रही अल नीनो की मजबूत संभावना

बिजनेसलाइन की खबर के अनुसार, ECMWF के 50 अलग-अलग मॉडलों के विश्लेषण से यह संकेत मिला है कि इस साल अल नीनो बनने की संभावना बहुत ज्यादा है. पूर्वानुमान के अनुसार लगभग 98 प्रतिशत संभावना मध्यम अल नीनो की, 80 प्रतिशत संभावना मजबूत अल नीनो की और करीब 22 प्रतिशत संभावना सुपर अल नीनो बनने की बताई गई है.

विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशांत महासागर के जिस हिस्से को NINO3.4 क्षेत्र कहा जाता है, वहां समुद्र की सतह का तापमान तेजी से बढ़ रहा है. इसी क्षेत्र में होने वाले बदलाव से अल नीनो की शुरुआत होती है.

जापानी वैज्ञानिकों ने भी जताई थी यही संभावना

यूरोपीय मौसम एजेंसी के इस पूर्वानुमान को जापान के वैज्ञानिकों के अध्ययन से भी समर्थन मिला है. जापान एजेंसी फॉर मरीन-अर्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक स्वाधीन बेहरा ने पहले ही कहा था कि मौजूदा ला नीना (La Niña) के कमजोर पड़ने के बाद इस साल मजबूत अल नीनो विकसित हो सकता है.

उनके मॉडल के अनुसार अल नीनो के साथ-साथ इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) के सकारात्मक चरण में जाने की भी संभावना है. इसका मतलब यह है कि हिंद महासागर के पश्चिमी हिस्से का पानी पूर्वी हिस्से की तुलना में ज्यादा गर्म हो सकता है. कई बार यह स्थिति भारत के मानसून के लिए फायदेमंद भी साबित होती है.

सुपर अल नीनो की भी संभावना

जापान के ही एक अन्य वैज्ञानिक साजी हमीद ने मीडिया से बात करते हुए कहा है कि अगर समुद्र का तापमान इसी तरह तेजी से बढ़ता रहा और वातावरण का सहयोग मिला तो यह स्थिति सुपर अल नीनो तक पहुंच सकती है.

सुपर अल नीनो बहुत कम देखने को मिलता है, लेकिन इसका असर दुनिया भर के मौसम पर काफी बड़ा होता है. पिछली बार ऐसा शक्तिशाली अल नीनो 1997-98 में देखा गया था. उस समय कई देशों में मौसम में बड़े बदलाव हुए थे. हालांकि उसी साल भारत में मानसून सामान्य से बेहतर रहा था क्योंकि उस समय सकारात्मक IOD भी सक्रिय था.

हवाओं की दिशा में बदलाव से बढ़ रहा असर

सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर में हवाएं पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं, जिन्हें ट्रेड विंड्स कहा जाता है. लेकिन इस समय स्थिति बदलती दिखाई दे रही है. मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अब पश्चिम से पूर्व की ओर चलने वाली तेज हवाएं इन ट्रेड विंड्स को कमजोर कर रही हैं. इससे समुद्र का गर्म पानी पश्चिमी प्रशांत से पूर्वी प्रशांत की ओर फैलने लगा है. यही प्रक्रिया अल नीनो बनने की शुरुआत मानी जाती है.

केल्विन वेव और MJO भी निभा सकते हैं भूमिका

विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र के भीतर बनने वाली केल्विन वेव भी इस प्रक्रिया को तेज कर रही हैं. हाल के महीनों में ऐसी कई मजबूत लहरें देखी गई हैं, जो गर्म पानी को पश्चिम से पूर्व की ओर ले जा रही हैं. इसके अलावा मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) नाम की मौसम प्रणाली भी अल नीनो को मजबूत करने में भूमिका निभा सकती है. यदि आने वाले समय में MJO सक्रिय होता है तो बादल और बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं, जिससे अल नीनो की प्रक्रिया तेज हो सकती है.

भारत के मानसून पर पड़ सकता है असर

अल नीनो का भारत के मानसून से गहरा संबंध माना जाता है. आमतौर पर अल नीनो के वर्षों में मानसून कमजोर पड़ने की संभावना रहती है, लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता. यदि उसी समय सकारात्मक IOD भी सक्रिय हो जाए तो मानसून पर पड़ने वाला नकारात्मक असर कम हो सकता है.

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अभी स्थिति पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन आने वाले कुछ महीनों में समुद्र के तापमान और हवाओं की स्थिति से यह तय होगा कि अल नीनो कितना मजबूत बनेगा और इसका भारत के मानसून पर कितना असर पड़ेगा.

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