Climate change report: देश में मौसम तेजी से बदल रहा है और आने वाले वर्षों में इसके असर और ज्यादा देखने को मिल सकते हैं. एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अगले दो दशकों में हर साल असामान्य रूप से ज्यादा गर्म दिनों की संख्या बढ़ सकती है. यह जानकारी एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित प्लेटफॉर्म CRAVIS ने दी है, जिसे ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद ने विकसित किया है.
हर साल बढ़ेंगे 15 से 40 ज्यादा गर्म दिन
इस प्लेटफॉर्म के अनुसार, आने वाले 20 वर्षों में भारत में हर साल 15 से 40 अतिरिक्त बेहद गर्म दिन देखने को मिल सकते हैं. यह आंकड़ा 1981 से 2010 के औसत मौसम के आधार की तुलना में है. इसका मतलब है कि गर्मी का असर पहले से ज्यादा लंबा और तीव्र हो सकता है, जिससे लोगों के स्वास्थ्य, खेती और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर पड़ेगा.
गर्म रातें भी बनेंगी बड़ी समस्या
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सिर्फ दिन ही नहीं, बल्कि रातें भी ज्यादा गर्म होंगी. कई इलाकों में हर साल 20 से 40 ज्यादा गर्म रातें दर्ज की जा सकती हैं. इससे लोगों को रात में भी राहत नहीं मिलेगी और नींद, स्वास्थ्य और ऊर्जा पर असर पड़ सकता है.
भारी बारिश की घटनाएं भी बढ़ेंगी
गर्मी के साथ-साथ बारिश का पैटर्न भी बदलने वाला है. CRAVIS के मुताबिक, आने वाले वर्षों में भारी बारिश की घटनाएं लगातार बढ़ेंगी. कई जिलों में हर साल 10 से 30 अतिरिक्त भारी बारिश वाले दिन देखने को मिल सकते हैं. इसका मतलब है कि बाढ़, जलभराव और फसलों को नुकसान जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं.
किन राज्यों पर ज्यादा असर पड़ेगा?
रिपोर्ट के अनुसार, मध्य और दक्षिण भारत के कई राज्यों पर इसका ज्यादा असर देखने को मिलेगा. खासकर महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में गर्मी और बारिश दोनों में बढ़ोतरी होने की संभावना है. इन क्षेत्रों में मौसम का असंतुलन खेती, जल संसाधनों और शहरों के जीवन पर सीधा असर डाल सकता है.
40 साल के डेटा पर आधारित है अनुमान
यह प्लेटफॉर्म पिछले 40 वर्षों के मौसम डेटा का विश्लेषण करके भविष्य का अनुमान लगाता है. यह 2030-2050 और 2051-2070 तक के लिए भी मौसम की संभावनाएं बता सकता है. CRAVIS की खास बात यह है कि यह जिला, राज्य और छोटे स्तर तक मौसम से जुड़ी जानकारी देता है, जिससे सरकार और नीति बनाने वाले लोग बेहतर फैसले ले सकते हैं.
कैसे काम करता है यह प्लेटफॉर्म?
CRAVIS में करीब 279 तरह के मौसम संकेतकों (इंडिकेटर्स) का इस्तेमाल किया गया है, जिन्हें 20 से ज्यादा आसान मापदंडों में बदला गया है. इसमें तापमान, बारिश और नमी जैसी चीजों का विश्लेषण किया जाता है. इससे यह समझना आसान हो जाता है कि आने वाले समय में किस क्षेत्र में किस तरह का मौसम रहेगा.
फैसले लेने में मिलेगी मदद
इस प्लेटफॉर्म का मकसद मौसम से जुड़ी जानकारी को सिर्फ वैज्ञानिक रिपोर्ट तक सीमित न रखकर उसे सरकार और नीति निर्माताओं तक पहुंचाना है. इससे जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक योजनाएं बेहतर तरीके से बनाई जा सकेंगी और समय रहते तैयारी की जा सकेगी.
क्यों जरूरी है यह चेतावनी?
जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ एक चर्चा का विषय नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर अब साफ दिखाई देने लगा है. बढ़ती गर्मी और अनियमित बारिश से खेती, पानी और स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ सकता है. ऐसे में इस तरह की तकनीक और डेटा भविष्य की तैयारी के लिए बेहद जरूरी हो गए हैं.