El Nino: दुनियाभर में मौसम को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि प्रशांत महासागर में अल नीनो (El Nino) की स्थिति तेजी से मजबूत हो रही है. जुलाई से सितंबर 2026 के बीच इसके और अधिक प्रभावी होने की संभावना है. इसके चलते दुनिया के कई हिस्सों में भीषण गर्मी, सूखा, भारी बारिश और अन्य चरम मौसम घटनाएं देखने को मिल सकती हैं. भारत समेत कई देश में मॉनसून पर भी इसका असर पड़ने की आशंका जताई गई है.
क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ती है चिंता?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रणाली है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. यह बदलाव दुनिया भर के मौसम को प्रभावित करता है. आमतौर पर अल नीनो हर 2 से 7 साल में एक बार आता है और इसका असर करीब 9 से 12 महीने तक रह सकता है. यह मार्च से जून के बीच विकसित होना शुरू होता है और नवंबर से फरवरी के बीच सबसे ज्यादा प्रभावी रहता है.
तेजी से मजबूत हो रहा है अल नीनो
WMO की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान अल नीनो तेजी से मजबूत होगा. मौसम एजेंसियों के संयुक्त अनुमान बताते हैं कि, मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का समुद्री सतह तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक रह सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि सितंबर से नवंबर के बीच इसका असर और बढ़ सकता है, जिससे कई देशों में मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिणी और उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों को छोड़कर दुनिया के अधिकांश आबादी वाले इलाकों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है. सिर्फ प्रशांत महासागर ही नहीं, बल्कि हिंद महासागर और उष्णकटिबंधीय (Tropical Zone) अटलांटिक महासागर का तापमान भी सामान्य से ज्यादा रहने का अनुमान है. यही वजह है कि वैश्विक स्तर पर हीटवेव का खतरा बढ़ सकता है.
भारत में मॉनसून पर पड़ सकता है असर
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई से सितंबर के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना बनी हुई है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे देश में एक जैसा असर होगा. कुछ इलाकों में सामान्य बारिश हो सकती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में बारिश की कमी देखने को मिल सकती है. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो का असर उसकी ताकत, अवधि और अन्य मौसम प्रणालियों, जैसे इंडियन ओशन डाइपोल (Indian Ocean Dipole), पर भी निर्भर करता है. इसलिए हर क्षेत्र में इसका प्रभाव अलग-अलग हो सकता है.
किन देशों में कैसा रहेगा असर?
WMO के मुताबिक, अल नीनो के दौरान दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम का अलग असर देखने को मिलेगा.
- मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में सामान्य से ज्यादा बारिश होने की संभावना है.
- भारत, ऑस्ट्रेलिया और हिंद महासागर के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है.
- दक्षिणी यूरोप में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना है, जबकि उत्तरी यूरोप में बारिश कम रह सकती है.
- मध्य अमेरिका, कैरेबियन और उत्तर-पश्चिमी दक्षिण अमेरिका के कई इलाकों में भी बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान है.
हर बार एक जैसा नहीं होता असर
अल नीनो का मतलब हर जगह सूखा या हर जगह भारी बारिश नहीं होता. इसका प्रभाव हर देश और हर क्षेत्र में अलग-अलग हो सकता है. कई बार अल नीनो के दौरान भी कुछ क्षेत्रों में सामान्य या उससे ज्यादा बारिश होती है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बन जाती है. यही कारण है कि मौसम विभाग लगातार समुद्री तापमान और वैश्विक जलवायु संकेतों पर नजर बनाए हुए है. आने वाले महीनों में अल नीनो कितना मजबूत होता है, उसी के आधार पर दुनिया के कई देशों, खासकर कृषि पर निर्भर क्षेत्रों के मौसम की दिशा तय होगी.