Greenhouse Farming: समय के साथ खेती करने का तरीका भी तेजी से बदल रहा है. खेती में लागत कम करने और उत्पादन बढ़ाने के लिए रोज खेती करने की नई-नई तकनीकें विकसित की जा रही हैं. वहीं, केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारें भी नई-नई तकनीकों को अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रही हैं. इसके लिए किसानों को सब्सिडी भी दी जाती है. इन्हीं नई तकनीकों में खेती की एक मॉडर्न विधि ग्रीनहाउस है. ग्रीनहाउस अब प्रगतिशील किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. इससे किसानों को फायदा भी हो रहा है. तो आइए आज जानते हैं ग्रीनहाउस के बारे में.
क्या है ग्रीनहाउस तकनीक
ग्रीनहाउस खेती एक आधुनिक और स्मार्ट कृषि तरीका है, जिसमें नियंत्रित वातावरण में फसलें उगाई जाती हैं. इसमें तापमान, नमी और रोशनी जैसे जरूरी कारकों को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है. इससे मौसम की मार का असर कम होता है और पौधों को बेहतर बढ़ने की स्थितियां मिलती हैं. ग्रीनहाउस खेती से किसान फसल पर ज्यादा नियंत्रण रख सकते हैं और स्थिर व बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं.
ग्रीनहाउस विधि से कैसे होती है खेती
ग्रीनहाउस खेती में खास तौर पर बनाई गई संरचनाओं के भीतर फसलें उगाई जाती हैं. ये संरचनाएं पौधों को मौसम के अचानक बदलने जैसे खतरे से बचाती हैं और एक सुरक्षित माहौल देती हैं. इसका मकसद ऐसा स्थिर वातावरण बनाना होता है, जिसमें फसल की बढ़वार बेहतर हो और नुकसान का जोखिम कम रहे. सब्जी, फल या फूल- ग्रीनहाउस खेती से कम समय में बेहतर गुणवत्ता और ज्यादा उत्पादन संभव हो पाता है.
ग्रीनहाउस खेती में किसान अपनी फसलों के लिए माहौल को पूरी तरह नियंत्रित कर सकते हैं. पौधों की जरूरत के अनुसार तापमान बदला जा सकता है और नमी को संतुलित रखकर बीमारियों से बचाव किया जा सकता है. सही रोशनी की व्यवस्था से पौधों को प्रकाश संश्लेषण के लिए जरूरी ऊर्जा मिलती है. इस तरह का नियंत्रण फसलों के स्वस्थ विकास के लिए बेहतरीन परिस्थितियां तैयार करता है.
किन-किन फसलों की कर सकते हैं खेती
ग्रीनहाउस आमतौर पर कांच या प्लास्टिक जैसी सामग्री से बनाए जाते हैं. ये सामग्री सूरज की रोशनी को अंदर आने देती है और फसलों को खराब मौसम से सुरक्षित रखती हैं. कांच के ग्रीनहाउस ज्यादा पारदर्शी और टिकाऊ होते हैं, जबकि प्लास्टिक के ग्रीनहाउस हल्के और कम लागत वाले होते हैं. दोनों ही विकल्प पौधों को कीटों और अत्यधिक मौसम से बचाकर सुरक्षित माहौल देते हैं.
ग्रीनहाउस के निर्माण पर कितना आएगा खर्च
ग्रीनहाउस बनाने की लागत उसके आकार, इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री और लगाए जाने वाले उपकरणों पर निर्भर करती है. आम तौर पर इसका खर्च 700 रुपये से 1000 रुपये प्रति वर्ग मीटर या 500 रुपये से 3000 रुपये प्रति वर्ग फुट तक हो सकता है. छोटे या DIY ग्रीनहाउस 10,000 रुपये से 1 लाख रुपये के बीच बन जाते हैं, जबकि मध्यम स्तर के ग्रीनहाउस पर 2 लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है. बड़े और व्यावसायिक ग्रीनहाउस, जिनमें ऑटोमेशन और एडवांस सिस्टम लगे होते हैं, उनकी लागत लगभग 10 लाख रुरये से 50 लाख रुपये प्रति एकड़ तक हो सकती है.
यहां ग्रीनहाउस की लागत को प्रति वर्ग मीटर और प्रति वर्ग फुट के हिसाब से सरल चार्ट में दिखाया गया है:
| ग्रीनहाउस का आकार | लागत प्रति वर्ग मीटर (₹) | लागत प्रति वर्ग फुट (₹) | विशेषताएं / नोट्स |
|---|---|---|---|
| छोटे / DIY | 700 – 1,000 | 500 – 3,000 | छोटा आकार, साधारण सामग्री, बेसिक उपकरण |
| मध्यम | 700 – 1,000 | 500 – 3,000 | बेहतर सामग्री, कुछ ऑटोमेशन, तैयार किट |
| बड़े / व्यावसायिक | 700 – 1,000 | 500 – 3,000 | ऑटोमेशन, एडवांस सिस्टम, उच्च गुणवत्ता |
नोट:- वास्तविक खर्च आकार, सामग्री और लगाए गए उपकरणों के अनुसार बढ़ या घट सकता है.
ग्रीनहाउस में मजबूत फ्रेम का इस्तेमाल होता है, जो गैल्वेनाइज्ड स्टील, एल्युमिनियम या लकड़ी से बना होता है. कवरिंग के लिए UV-ट्रीटेड पॉलीथीन, पॉलीकार्बोनेट शीट या कांच लगाया जाता है. हवा के लिए पंखे लगाए जाते हैं. तापमान कंट्रोल के लिए हीटिंग और कूलिंग सिस्टम होते हैं. pH मीटर और थर्मामीटर से निगरानी की जाती है, ताकि फसलों को सही माहौल मिल सके.
ग्रीनहाउस के अंदर खेती करने के फायदे
- साल भर उत्पादन: मौसम पर निर्भरता कम, हर मौसम में फसल उगाई जा सकती है.
- उच्च पैदावार: नियंत्रित वातावरण से पौधों की वृद्धि बेहतर और दाने/फल अधिक.
- बीमारियों से सुरक्षा: कीट और रोगों का खतरा कम होता है.
- जल संरक्षण: ड्रिप सिंचाई और नियंत्रित पानी से जल की बचत.
- कृषि विविधता: सब्जियां, फल और फूल जैसी कई फसलें उगाई जा सकती हैं.
- बेहतर गुणवत्ता: पौधों की उपज और पोषण गुणवत्ता उच्च रहती है.
- कम नुकसान: बाहरी मौसम (बाढ़, सूखा, तूफान) से फसल सुरक्षित.
ग्रीनहाउस खेती की मुख्य चुनौतियां
- उच्च शुरुआती खर्च: फ्रेम, कवरिंग, वेंटिलेशन और उपकरण महंगे होते हैं.
- तकनीकी ज्ञान की जरूरत: तापमान, आर्द्रता, सिंचाई और पोषण नियंत्रित करना सीखना जरूरी.
- ऊर्जा लागत: हीटिंग, कूलिंग और लाइटिंग के लिए बिजली खर्च बढ़ सकता है.
- रखरखाव: ग्रीनहाउस की संरचना और उपकरणों का नियमित रखरखाव जरूरी.
- कीट और रोग: नियंत्रित वातावरण में भी कभी-कभी रोग और कीट प्रभावित कर सकते हैं.
- सही फसल और मौसम का चयन: सभी फसलें ग्रीनहाउस में नहीं उग सकतीं, गलत चयन नुकसान कर सकता है.
इन फसलों की होती है अधिक खेती
ग्रीनहाउस में आमतौर पर ऐसी फसलें उगाई जाती हैं जिनकी सालभर मांग रहती है. सबसे ज्यादा खीरा, सलाद पत्ता, टमाटर और शिमला मिर्च उगाई जाती हैं. ऑफ-सीजन में इनकी मांग बढ़ जाती है, जिससे किसान इन्हें अच्छे दाम में बेचकर ज्यादा लाभ कमा सकते हैं. यही कारण है कि ग्रीनहाउस खेती किसानों के लिए फायदे का साधन बन रही है. यानी ग्रीनहाउस तकनीक से खेती करने पर किसानों की कमाई दोगुनी हो सकती है.
सरकार देती है सब्सिडी
ग्रीनहाउस खेती की सबसे बड़ी चुनौती इसकी शुरुआती लागत है. छोटे और मध्यम किसानों के लिए चेंबर बनाना, तापमान नियंत्रित करने वाले उपकरण लगाना और उनकी देखभाल करना महंगा पड़ता है. लेकिन बिहार और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में सरकार 50 फीसदी तक सब्सिडी दे रही है, जिससे किसान धीरे-धीरे इस तकनीक को अपनाने लगे हैं और जागरूकता बढ़ने से रुझान तेजी से बढ़ रहा है.
किसान की दोगुनी हो गई कमाई
अभी देश में हजारों नहीं बल्कि लाखों के संख्या में किसान ग्रीनहाउस को अपना रहे हैं. इससे उनकी कमाई दोगुनी हो गई है. अभी बिहार के समस्तीपुर में कई किसान ग्रीनहाउस तकनीक से खेती कर बंपर कमाई कर रहे हैं. जिले के मोरवा प्रखंड के मुड़वा क्षेत्र के किसान इस बदलाव के उदाहरण हैं. यहां किसान ग्रीनहाउस तकनीक अपनाकर शिमला मिर्च की खेती कर रहे हैं. लगभग 10 कट्ठा के प्लॉट में ग्रीन हाउस लगाकर वे बेहतर गुणवत्ता वाली शिमला मिर्च उगा रहे हैं. नियंत्रित तापमान और वैज्ञानिक तरीके से फसल जल्दी और अच्छी तरह बढ़ रही है, जिससे उत्पादन भी उम्मीद से ज्यादा मिल रहा है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, किसान कुमुद कुमार झा का कहना है कि आधुनिक मशीनों और तकनीक की मदद से चार महीने में एक बीघा जमीन से चार-पांच लाख रुपये तक की कमाई हो सकती है. यानी इससे किसानों की कमाई दोगुनी हो जाएगी