असम में चाय बागान मजदूरों को जमीन देने पर फंसा पेंच, कंपनियों ने सरकार से की बातचीत की मांग

चाय बागान मालिक इस पहल के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उनका कहना है कि इसे लागू करने में कई व्यावहारिक और कानूनी अड़चनें हैं. उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि चाय बागानों की जमीन सिर्फ खाली भूमि नहीं है, बल्कि उस पर बने आवास, सड़कें और अन्य ढांचागत सुविधाएं भी हैं,

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 7 Jan, 2026 | 08:53 AM

workers land rights: असम विधानसभा ने नवंबर 2025 में असम फिक्सेशन ऑफ सीलिंग ऑफ लैंड होल्डिंग्स (संशोधन) अधिनियम पारित किया. इसके जरिए चाय बागानों की लेबर लाइनों में रहने वाले श्रमिकों को ‘पट्टा’ यानी जमीन का अधिकार देने का रास्ता साफ हुआ. इस कानून से राज्य के करीब 825 चाय बागानों में रहने वाले 14 लाख से ज्यादा लोगों को लाभ मिलने की संभावना है. सरकार का मानना है कि इससे श्रमिकों को स्थायित्व मिलेगा, वे अपने घर बना सकेंगे और सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी.

चाय कंपनियों की चिंता कहां से शुरू होती है?

चाय बागान मालिक इस पहल के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उनका कहना है कि इसे लागू करने में कई व्यावहारिक और कानूनी अड़चनें हैं. उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि चाय बागानों की जमीन सिर्फ खाली भूमि नहीं है, बल्कि उस पर बने आवास, सड़कें और अन्य ढांचागत सुविधाएं भी हैं, जिनमें कंपनियों का भारी निवेश है. ऐसे में बिना स्पष्ट मुआवजा और नियम तय किए जमीन का हस्तांतरण भविष्य में विवाद पैदा कर सकता है.

TAI और सीसीपीए की भूमिका

बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, चाय उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाएं, खासकर Tea Association of India और कंसल्टेटिव कमेटी ऑफ प्लांटेशन एसोसिएशंस (CCPA) ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर अपने पक्ष से अवगत कराया है. टीएआई के अध्यक्ष संदीप सिंघानिया का कहना है कि कानून लागू करने से पहले कंपनियों के साथ खुली चर्चा जरूरी है, ताकि भविष्य में कानूनी और वित्तीय उलझनें न खड़ी हों.

उनका तर्क है कि कई चाय बागानों की जमीन बैंकों के पास गिरवी है. अगर उस जमीन का हिस्सा श्रमिकों को दे दिया गया, तो बैंकों की सहमति के बिना यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती. इसके अलावा, ‘पट्टा’ मिलने के बाद जमीन की खरीद-बिक्री संभव हो जाएगी, जिसे रोकना मुश्किल होगा.

श्रमिक आवास और मौजूदा कानून

चाय बागानों में श्रमिकों को आवास उपलब्ध कराना कंपनियों की कानूनी जिम्मेदारी है. यह प्रावधान पहले प्लांटेशन लेबर एक्ट 1951 में था, जो अब केंद्र सरकार के नए श्रम कानूनों में शामिल हो चुका है. चाय कंपनियों का कहना है कि अगर जमीन श्रमिकों के नाम हो भी जाती है, तब भी मौजूदा कानून के तहत आवास और अन्य सुविधाएं देने की जिम्मेदारी प्रबंधन पर बनी रहेगी. ऐसे में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जमीन हस्तांतरण के बाद जिम्मेदारियां किसकी होंगी.

मुख्यमंत्री का सख्त रुख और उद्योग की प्रतिक्रिया

इस पूरे मामले पर असम के मुख्यमंत्री हेमन्त बिश्वा शर्मा का रुख सख्त नजर आ रहा है. उन्होंने साफ कहा है कि अगर चाय बागान मालिक श्रमिकों को जमीन देने में अड़चन डालेंगे, तो उन्हें मिलने वाले सरकारी प्रोत्साहनों पर पुनर्विचार किया जा सकता है. सरकार हर साल चाय उद्योग को करीब 150 करोड़ रुपये की सहायता देती है.

हालांकि उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि प्रोत्साहन योजनाओं और भूमि कानून को जोड़ना सही नहीं है. उनके मुताबिक, अगर चाय बागान किसी योजना की शर्तें पूरी करते हैं, तो उन्हें उसका लाभ मिलना चाहिए.

बन सकती है मिसाल

चाय उद्योग और सरकार, दोनों ही यह मानते हैं कि श्रमिकों का कल्याण जरूरी है. फर्क सिर्फ तरीके को लेकर है. कंपनियां चाहती हैं कि जमीन देने से पहले मुआवजे, बैंकों की सहमति और कानूनी जिम्मेदारियों को लेकर स्पष्ट नीति बने. वहीं सरकार इस कानून को सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम मान रही है.

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि असम सरकार और चाय कंपनियों के बीच बातचीत का रास्ता कितना जल्दी निकलता है. अगर सहमति बनती है, तो यह पहल न सिर्फ असम बल्कि देश के अन्य चाय उत्पादक राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकती है.

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