India EU spice trade: भारतीय मसालों की खुशबू पूरी दुनिया में पसंद की जाती है. खासकर यूरोप में भारतीय मसालों की अच्छी मांग है. लेकिन अब सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा के कड़े मानक भी उतने ही जरूरी हो गए हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए ऑल इंडिया स्पाइसेज एक्सपोर्टर्स फोरम (AISEF) और यूरोपियन स्पाइस एसोसिएशन (ESA) ने मिलकर एक अहम समझौता किया है. इस समझौते का मकसद भारत और यूरोप के बीच मसाला व्यापार को और सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाना है.
कोच्चि में हुआ अहम करार
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह समझौता कोच्चि में आयोजित इंटरनेशनल स्पाइस कॉन्फ्रेंस 2026 के दौरान हुआ. AISEF के चेयरमैन इमैनुएल नंबुस्सेरिल और ESA के चेयरमैन बेनोइट विन्स्टेल ने इस पर हस्ताक्षर किए. दोनों संगठनों ने साफ कहा कि उपभोक्ताओं की सेहत से कोई समझौता नहीं किया जाएगा और सप्लाई चेन में जिम्मेदारी और ईमानदारी को प्राथमिकता दी जाएगी.
मिलावट और गलत प्रक्रियाओं पर सख्ती
समझौते में साफ तौर पर कहा गया है कि खाद्य मिलावट को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. यूरोपीय संघ में जिन प्रक्रियाओं पर रोक है, जैसे एथिलीन ऑक्साइड से स्टेरिलाइजेशन, उनका इस्तेमाल यूरोप भेजे जाने वाले मसालों में नहीं किया जाएगा. साथ ही यह भी तय किया गया है कि किसी भी तरह की छिपी हुई या नियमों के खिलाफ की गई प्रोसेसिंग, जैसे बिना जानकारी दिए इर्रेडिएशन या गैर-मानक रसायनों का इस्तेमाल, सख्ती से रोका जाएगा. इसका सीधा मतलब है कि भारतीय मसाले यूरोप पहुंचने से पहले पूरी तरह जांचे-परखे और नियमों के अनुरूप होने चाहिए.
दो साल तक चलेगा सहयोग
यह समझौता दो वर्षों के लिए है. इस दौरान दोनों संगठन एक-दूसरे के साथ नियमों और बाजार से जुड़ी नई जानकारी साझा करेंगे. यूरोप में यदि किसी नए नियम या अवशेष सीमा (MRL) में बदलाव होता है, तो उसकी जानकारी भारतीय निर्यातकों तक समय पर पहुंचाई जाएगी. वहीं AISEF यह सुनिश्चित करेगा कि भारतीय सप्लाई चेन में इन नियमों का सही तरीके से पालन हो.
स्वच्छता, कीटनाशक अवशेष की सीमा, उत्पाद की ट्रेसबिलिटी यानी खेत से बाजार तक पूरी जानकारी, और टिकाऊ खेती जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.
क्यों जरूरी है यह कदम?
आज यूरोपीय बाजार में नियम पहले से कहीं ज्यादा सख्त हो गए हैं. थोड़ी सी लापरवाही भी खेप के रिजेक्ट होने का कारण बन सकती है. ऐसे में भारतीय निर्यातकों के लिए जरूरी है कि वे अंतरराष्ट्रीय मानकों को समझें और उसी के अनुसार उत्पादन करें.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारतीय मसाला उद्योग के लिए फायदेमंद साबित होगा. इससे न केवल गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि यूरोप जैसे बड़े बाजार में भारतीय मसालों की साख भी मजबूत होगी.
भारत लंबे समय से दुनिया का प्रमुख मसाला निर्यातक रहा है. अब यह पहल इस बात का संकेत है कि भारतीय उद्योग सिर्फ व्यापार ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता और उपभोक्ता सुरक्षा को भी उतनी ही अहमियत दे रहा है.