Food Inflation: कमजोर मॉनसून और सामान्य से कम बारिश के कारण देश में खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका जताई गई है. केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में खाद्य महंगाई दर औसतन 6 फीसदी रह सकती है, जबकि खुदरा महंगाई (CPI) करीब 5 फीसदी रहने का अनुमान है. विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश की कमी से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़ सकते हैं.
केयरएज रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1 जून से 29 जून 2026 के बीच देश में मॉनसूनी बारिश सामान्य औसत से 41.5 फीसदी कम रही. बारिश में आई यह बड़ी कमी खाद्यान्न उत्पादन और महंगाई को लेकर चिंता बढ़ा रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कम बारिश का असर फसलों की पैदावार पर पड़ सकता है, जिससे खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी होने की आशंका है. पहले से ही खाद्य तेलों की महंगाई ऊंचे स्तर पर बनी हुई है. मई महीने में खाद्य तेलों की महंगाई दर 9.5 फीसदी दर्ज की गई थी. ऐसे में कमजोर मॉनसून आगे चलकर खाद्य महंगाई पर और दबाव बढ़ा सकता है.
व्यापार घाटा पिछले साल के स्तर के आसपास बना हुआ है
केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि मॉनसून कमजोर रहता है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में खाद्य महंगाई दर औसतन 6 फीसदी और खुदरा महंगाई (CPI) करीब 5 फीसदी रह सकती है. रिपोर्ट में कृषि के अलावा भारत के विदेशी व्यापार की स्थिति का भी जिक्र किया गया है. इसमें कहा गया है कि तेल आयात-निर्यात से जुड़ा व्यापार घाटा पिछले साल के स्तर के आसपास बना हुआ है, लेकिन गैर-तेल (नॉन-ऑयल) व्यापार घाटा चालू वित्त वर्ष में बढ़ा है.
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व्यापार घाटे के दबाव को कुछ हद तक संतुलित करेगा
हालांकि, सेवा क्षेत्र के निर्यात ने अर्थव्यवस्था को राहत दी है. आईटी, वित्तीय सेवाओं और अन्य सेवा क्षेत्रों के बेहतर प्रदर्शन के कारण सेवा निर्यात से होने वाला व्यापार अधिशेष (सरप्लस) पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रहा है, जिससे बढ़ते व्यापार घाटे के असर को कुछ हद तक संतुलित करने में मदद मिली है. केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार, सेवा क्षेत्र के निर्यात में लगातार मजबूती भारत के बढ़ते व्यापार घाटे के असर को कम करने में मदद कर सकती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में सेवाओं के निर्यात से मिलने वाला समर्थन वस्तुओं के व्यापार घाटे के दबाव को कुछ हद तक संतुलित करेगा.
एफडीआई प्रवाह सालाना आधार पर 66 फीसदी बढ़ा
रिपोर्ट में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को लेकर भी सकारात्मक संकेत दिए गए हैं. अप्रैल 2026 में सकल एफडीआई प्रवाह सालाना आधार पर 66 फीसदी बढ़ा. साथ ही, विदेशी कंपनियों द्वारा मुनाफे की वापसी (Profit Repatriation) में कमी आई. इसके परिणामस्वरूप अप्रैल 2026 में शुद्ध एफडीआई प्रवाह (Net FDI Inflows) बढ़कर 6.6 अरब डॉलर पहुंच गया, जो अप्रैल 2025 में 1.6 अरब डॉलर था.
अप्रैल 2026 में रेमिटेंस सालाना आधार पर 70 फीसदी बढ़ा
विदेशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली रकम में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई. अप्रैल 2026 में रेमिटेंस सालाना आधार पर 70 फीसदी बढ़ा. यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में संघर्ष जारी है, जबकि यह क्षेत्र भारत के लिए रेमिटेंस का एक प्रमुख स्रोत माना जाता है. रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2026 में भारत के चालू खाते में 4.7 अरब डॉलर का अधिशेष दर्ज किया गया. हालांकि, बड़े पैमाने पर पूंजी निकासी के कारण देश का कुल भुगतान संतुलन 6.6 अरब डॉलर के घाटे में रहा. वहीं, पश्चिम एशिया के बाहर भू-राजनीतिक तनाव कम होने से घरेलू बॉन्ड बाजार को कुछ राहत मिली है.
सरकारी बॉन्ड यील्ड 6.8 से 6.9 फीसदी के दायरे में रहने की संभावना है
केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की घोषणा के बाद सरकारी वित्तीय दबाव बढ़ने की आशंकाएं कम हुई हैं. इसका असर सरकारी बॉन्ड बाजार पर भी दिखा है और पिछले एक महीने की तुलना में सरकारी प्रतिभूतियों की यील्ड में गिरावट दर्ज की गई है. रिपोर्ट के अनुसार, चालू वित्त वर्ष 2026-27 में सरकारी बॉन्ड यील्ड 6.8 से 6.9 फीसदी के दायरे में रहने की संभावना है.
भारतीय रुपया औसतन 92 से 93 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर रह सकता है
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और केंद्र सरकार के कई नीतिगत कदम रुपये को मजबूती देने में मदद कर सकते हैं. एफसीएनआर (बी) जमा, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECB), सरकारी प्रतिभूतियों के लिए फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के विस्तार और कुछ कर छूट जैसे उपायों से विदेशी निवेश आकर्षित होने की उम्मीद है. केयरएज रेटिंग्स का अनुमान है कि यदि कच्चे तेल की औसत कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में भारतीय रुपया औसतन 92 से 93 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर रह सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, इन उपायों से रुपये पर दबाव कम होगा और उसकी कीमत में बड़ी गिरावट की आशंका भी सीमित रहेगी.