देश में खाने का तेल हर घर की रोजमर्रा की जरूरत है. सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक, हर रसोई इससे जुड़ी होती है. लेकिन अब इस जरूरी चीज के पीछे का पूरा कारोबार एक नए दबाव में आ गया है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रहे तनाव का असर धीरे-धीरे भारत के खाद्य तेल सेक्टर पर दिखने लगा है. SEA (Solvent Extractors’ Association of India) ने भी इस स्थिति को लेकर चिंता जताई है और कहा है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो इसका असर लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है.
दुनिया में तनाव, बाजार में अनिश्चितता
हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव ने खाड़ी क्षेत्र के माहौल को अस्थिर कर दिया है. कुछ समय के लिए हालात शांत होते दिखे, जब युद्धविराम हुआ और होरमुज जलडमरूमध्य से आवाजाही शुरू हुई, लेकिन यह राहत ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी. अब स्थिति फिर से उलझी हुई है. कभी रास्ते खुलते हैं, तो कभी अचानक बंद हो जाते हैं. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने वालों के लिए यह समझना मुश्किल हो गया है कि आगे क्या होगा.
समुद्री रास्ते महंगे और जोखिम भरे
SEA की रिपोर्ट के अनुसार, स पूरे घटनाक्रम का सबसे ज्यादा असर शिपिंग पर पड़ा है. समुद्री रास्ते अब पहले जैसे सुरक्षित नहीं रहे. जहाज भेजना महंगा भी हो गया है और जोखिम भरा भी. खाद्य तेल का व्यापार काफी हद तक आयात-निर्यात पर निर्भर करता है, इसलिए जब शिपिंग की लागत बढ़ती है, तो इसका सीधा असर पूरे कारोबार पर पड़ता है. व्यापारियों के लिए आगे की योजना बनाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि लागत हर दिन बदल रही है.
पैकेजिंग भी हुई महंगी
यह संकट सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे जुड़ी चीजों पर भी असर डाल रहा है. प्लास्टिक पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल जैसे पॉलीएथिलीन और पॉलीप्रोपाइलीन की कीमतों में 50 से 60 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई है.
खाद्य तेल की कुल लागत में पैकेजिंग का हिस्सा काफी बड़ा होता है. ऐसे में जब पैकेजिंग महंगी होती है, तो कंपनियों के लिए कीमतें बढ़ाना मजबूरी बन जाता है. इसका असर आखिरकार आम उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है.
मानसून की चिंता भी बढ़ी
एक और चिंता यह है कि इस साल मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है. शुरुआती अनुमान बताते हैं कि बारिश करीब 92 प्रतिशत रह सकती है, जो सामान्य से कम मानी जाती है.
भारत में खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है. अगर बारिश कम होती है, तो फसलों का उत्पादन घट सकता है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने लगती हैं.
दो तरफ से बढ़ रहा दबाव
इस समय स्थिति ऐसी है कि एक तरफ वैश्विक तनाव के कारण लागत बढ़ रही है और दूसरी तरफ कमजोर मानसून का खतरा बना हुआ है. जब उत्पादन कम होगा और लागत ज्यादा, तो बाजार में महंगाई बढ़ना तय है. इसका सीधा असर आम लोगों की रसोई पर पड़ेगा, जहां हर दिन इस्तेमाल होने वाला तेल महंगा हो सकता है.
निर्यात भी हुआ प्रभावित
खाड़ी क्षेत्र में तनाव का असर भारत के ऑयलमील निर्यात पर भी साफ दिख रहा है. पश्चिम एशिया और यूरोप को जाने वाला निर्यात प्रभावित हुआ है, क्योंकि शिपिंग महंगी हो गई है और रास्तों में अनिश्चितता बनी हुई है. भारत से लगभग 65 प्रतिशत ऑयलमील फॉर ईस्ट देशों में जाता है, जबकि बाकी हिस्सा पश्चिम एशिया और यूरोप में भेजा जाता है. अब इन बाजारों में रुकावट आने से व्यापार प्रभावित हो रहा है.
नए रास्ते तलाशने की कोशिश
इन चुनौतियों के बीच उद्योग अब नए बाजारों की तलाश में जुट गया है. इसी दिशा में SEA जुलाई 2026 में फॉर ईस्ट देशों के लिए एक व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भेजने की तैयारी कर रहा है. इसका मकसद है नए व्यापारिक अवसर खोजना और निर्यात में आई कमी को पूरा करना.
उम्मीद अभी भी बाकी है
हालांकि हालात चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन उम्मीद खत्म नहीं हुई है. उद्योग को भरोसा है कि अगर कूटनीतिक स्तर पर प्रयास जारी रहे, तो जल्द ही स्थिति बेहतर हो सकती है. अगर वैश्विक माहौल स्थिर होता है, तो व्यापार भी सामान्य हो जाएगा और बाजार में संतुलन वापस आ सकता है.