रिपोर्ट: अंतरराष्ट्रीय हालात बिगड़े तो खेती पर असर तय, उर्वरक आयात प्रभावित होने की चेतावनी

खरीफ सीजन भारत के कृषि चक्र का बेहद अहम हिस्सा है. इस दौरान धान, मक्का, सोयाबीन जैसी फसलों की बुवाई होती है. अगर इसी समय उर्वरक की कमी हो जाए, तो उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है. अगर सप्लाई समय पर नहीं पहुंची, तो किसानों को या तो महंगे दाम पर खाद खरीदनी पड़ेगी या फिर पर्याप्त मात्रा में खाद नहीं मिल पाएगी.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 23 Mar, 2026 | 10:05 AM

देश में खरीफ सीजन शुरू होने से पहले ही एक नई चिंता सामने आ गई है. अंतरराष्ट्रीय हालात, खासकर पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर अब भारत की खेती पर भी पड़ने लगा है. CareEdge Ratings की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की उर्वरक (फर्टिलाइजर) सप्लाई खतरे में है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है. ऐसे में अगर हालात लंबे समय तक बिगड़े रहे, तो किसानों को खाद की कमी और महंगाई दोनों का सामना करना पड़ सकता है.

आयात पर निर्भरता बनी बड़ी चुनौती

रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपनी कुल उर्वरक जरूरत का करीब 26.2 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है. यानी हर चार में से एक हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है. इसके अलावा जॉर्डन से 19.2 प्रतिशत, रूस से 15.5 प्रतिशत और मोरक्को से 10.4 प्रतिशत उर्वरक आता है.

चीन, मिस्र, कनाडा और टोगो जैसे देशों से भी कुछ मात्रा में आयात होता है, लेकिन सबसे बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया का ही है. ऐसे में वहां कोई भी संकट सीधे भारत की सप्लाई पर असर डालता है.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना बड़ी चिंता का कारण

बिजनेसलाइन की खबर के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव का सबसे बड़ा असर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पड़ा है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है. इसी रास्ते से बड़ी मात्रा में ऊर्जा और उर्वरक से जुड़ा व्यापार होता है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि 2025 के पहले छह महीनों में इस मार्ग से गुजरने वाले 89 प्रतिशत कच्चे तेल और कंडेनसेट की सप्लाई एशियाई देशों को हुई, जिसमें भारत भी शामिल है. इतना ही नहीं, भारत अपने करीब 40 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात भी इसी रास्ते से करता है. अगर इस रास्ते में रुकावट आती है, तो इसका असर सिर्फ तेल पर ही नहीं, बल्कि उर्वरक की उपलब्धता पर भी पड़ता है.

बढ़ सकती हैं कीमतें और सब्सिडी का बोझ

गैस यानी एलएनजी उर्वरक बनाने का एक अहम कच्चा माल है. पश्चिम एशिया में संकट के कारण एलएनजी की कीमतें बढ़ रही हैं. इसका सीधा असर उर्वरक उत्पादन लागत पर पड़ता है.

रिपोर्ट के अनुसार, अगर यह स्थिति बनी रही तो उर्वरक महंगे हो सकते हैं. इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ेगा, क्योंकि किसानों को सस्ती दर पर खाद उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होती है.

खरीफ सीजन पर पड़ सकता है असर

खरीफ सीजन भारत के कृषि चक्र का बेहद अहम हिस्सा है. इस दौरान धान, मक्का, सोयाबीन जैसी फसलों की बुवाई होती है. अगर इसी समय उर्वरक की कमी हो जाए, तो उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सप्लाई समय पर नहीं पहुंची, तो किसानों को या तो महंगे दाम पर खाद खरीदनी पड़ेगी या फिर पर्याप्त मात्रा में खाद नहीं मिल पाएगी. दोनों ही स्थितियां खेती के लिए नुकसानदायक हैं.

एल नीनो का खतरा भी बढ़ा सकता है परेशानी

इस साल मौसम को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है. एल नीनो की संभावना जताई जा रही है, जिससे बारिश कम हो सकती है. अगर बारिश कम हुई और उर्वरक भी समय पर नहीं मिला, तो किसानों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं.

वहीं मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि भारत को उर्वरक सप्लाई के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशने होंगे. साथ ही घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर देना होगा, ताकि बाहरी निर्भरता कम हो सके.

सरकार और कंपनियां इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, लेकिन अगर पश्चिम एशिया में तनाव जल्दी नहीं सुलझा, तो इसका असर लंबे समय तक रह सकता है.

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