भारतीय प्याज की चमक फीकी, 22 प्रतिशत कमाई घटी और बाजार में पाकिस्तान हावी

दिलचस्प बात यह है कि अप्रैल से दिसंबर के बीच निर्यात की मात्रा में 37 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज हुई और यह 11.33 लाख टन तक पहुंच गई है. लेकिन इसके बावजूद कुल निर्यात मूल्य घट गया है. इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय प्याज को कम दाम पर बेचना पड़ा.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 27 Feb, 2026 | 08:57 AM

भारतीय रसोई में प्याज की अहमियत जितनी है, उतनी ही उसकी भूमिका देश की कृषि अर्थव्यवस्था में भी है. भारत दुनिया के बड़े प्याज उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है. लेकिन इस वित्त वर्ष में भारतीय प्याज निर्यात कई चुनौतियों से जूझता दिखाई दे रहा है. पारंपरिक खरीदार देशों से घटती मांग, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और पिछले वर्षों की नीतिगत बंदिशों का असर अब साफ नजर आने लगा है.

ताजा आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्त वर्ष की अप्रैल से दिसंबर अवधि में प्याज निर्यात का कुल मूल्य 22 प्रतिशत घटकर 298.69 मिलियन डॉलर रह गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 380.08 मिलियन डॉलर था. यानी मात्रा बढ़ने के बावजूद निर्यात से मिलने वाली कमाई कम हुई है. यह स्थिति निर्यातकों के लिए चिंता का विषय बन गई है.

पारंपरिक बाजारों में मांग कमजोर

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय प्याज के बड़े खरीदार रहे बांग्लादेश और सऊदी अरब से इस बार मांग में कमी देखी गई है. निर्यातकों का कहना है कि इन देशों ने अपनी घरेलू फसल पर ज्यादा भरोसा करना शुरू कर दिया है. इसके अलावा कुछ देशों ने पाकिस्तान, सूडान और यमन जैसे अन्य आपूर्तिकर्ताओं से प्याज खरीदना बढ़ा दिया है.

निर्यात नीतियों का पड़ा असर

पिछले कुछ वर्षों में घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने के लिए भारत सरकार ने कई बार प्याज निर्यात पर प्रतिबंध या शुल्क लगाया था. खासकर दिसंबर 2023 से मार्च 2024 तक लगाए गए निर्यात प्रतिबंध ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की छवि को प्रभावित किया. उस दौरान कई देशों ने वैकल्पिक सप्लायर खोज लिए और अब वे उन्हीं पर निर्भर हो गए हैं.

निर्यातकों का मानना है कि जब एक बार विदेशी खरीदार दूसरे स्रोत से आपूर्ति सुनिश्चित कर लेते हैं, तो उन्हें वापस लाना आसान नहीं होता. अब कई प्रतिस्पर्धी देश छह से नौ महीने तक लगातार निर्यात कर पा रहे हैं, जिससे वैश्विक बाजार में कीमतों की तुलना और प्रतिस्पर्धा दोनों बढ़ गई हैं.

मात्रा बढ़ी, लेकिन कमाई घटी

दिलचस्प बात यह है कि अप्रैल से दिसंबर के बीच निर्यात की मात्रा में 37 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज हुई और यह 11.33 लाख टन तक पहुंच गई है. लेकिन इसके बावजूद कुल निर्यात मूल्य घट गया है. इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय प्याज को कम दाम पर बेचना पड़ा. यानी ज्यादा मात्रा भेजने के बावजूद भी कम आमदनी हुई. यह स्थिति बताती है कि बाजार में कीमतों पर दबाव है और प्रतिस्पर्धा के कारण भारतीय निर्यातकों को रियायत देनी पड़ रही है.

पाकिस्तान से मिल रही कड़ी टक्कर

भारतीय प्याज को सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान से मिल रही है. पाकिस्तान की मुद्रा डॉलर के मुकाबले काफी कमजोर है. जहां भारत में डॉलर-रुपया विनिमय दर करीब 90.5 है, वहीं पाकिस्तान में यह लगभग 280 के आसपास है. इससे पाकिस्तानी प्याज अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता पड़ता है.

रबी फसल से जुड़ी उम्मीदें

महाराष्ट्र जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में मंडी भाव फिलहाल 775 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच चल रहे हैं. हाल के दिनों में कीमतों में नरमी आई है. व्यापारियों का मानना है कि इस बार रबी प्याज की फसल पिछले साल से बेहतर हो सकती है. अगर उत्पादन अच्छा रहा, तो घरेलू आपूर्ति मजबूत होगी और निर्यात के लिए पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहेगा.

बेहतर फसल और स्थिर नीतियों से भारत फिर से अपने पारंपरिक बाजारों में भरोसा जीत सकता है. हालांकि इसके लिए निरंतर आपूर्ति, प्रतिस्पर्धी कीमत और स्थायी निर्यात नीति जरूरी होगी.

वहीं भारतीय प्याज निर्यात इस समय एक संक्रमण काल से गुजर रहा है. मात्रा बढ़ने के बावजूद मूल्य में गिरावट, पारंपरिक बाजारों से कमजोर मांग और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा ने चुनौतियां बढ़ा दी हैं. फिर भी मजबूत उत्पादन और संतुलित नीतिगत फैसलों के जरिए भारत अपने निर्यात को दोबारा मजबूती दे सकता है.

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