चीन के आरोपों से हिला भारतीय चावल कारोबार, हो रहा करोड़ों का नुकसान… निर्यातकों ने केंद्र से मांगी मदद

इस मामले में ICAR ने साफ किया है कि भारत में किसी भी प्रकार के GMO चावल को व्यावसायिक खेती के लिए मंजूरी नहीं दी गई है. यानी भारत से जो भी चावल निर्यात किया जाता है, वह पूरी तरह नॉन-GMO होता है. ICAR ने यह भी बताया कि भारत में चावल से जुड़ा कोई भी शोध GMO पर आधारित नहीं है.

Kisan India
नई दिल्ली | Updated On: 28 Apr, 2026 | 07:45 AM

China GMO rice issue: भारत के चावल निर्यात क्षेत्र के सामने इन दिनों एक नई चुनौती खड़ी हो गई है, जिसने कारोबारियों की चिंता बढ़ा दी है. चीन द्वारा भारतीय चावल की खेपों पर लगाए गए प्रतिबंध और GMO (जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म) से जुड़े आरोपों के चलते निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. इस पूरे मामले में अब छत्तीसगढ़ के चावल निर्यातकों ने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है, ताकि जल्द समाधान निकल सके और व्यापार सामान्य हो सके.

क्या है पूरा मामला

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, छत्तीसगढ़ राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (TREACG) ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से अपील की है कि वे इस मुद्दे में हस्तक्षेप करें और भारतीय निर्यातकों के हितों की रक्षा करें. दरअसल, चीन ने हाल ही में भारत की कुछ नॉन-बासमती चावल की खेपों को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि उनमें GMO के अंश पाए गए हैं. इतना ही नहीं, चीन के कस्टम विभाग GACC ने तीन भारतीय कंपनियों को अस्थायी रूप से सस्पेंड भी कर दिया है.

इस फैसले से न केवल इन कंपनियों का व्यापार प्रभावित हुआ है, बल्कि पूरे चावल निर्यात सेक्टर में अनिश्चितता का माहौल बन गया है. निर्यातकों का कहना है कि यह आरोप पूरी तरह गलत हैं और इससे उन्हें आर्थिक रूप से बड़ा झटका लगा है.

भारत का पक्ष क्या है

इस मामले में ICAR ने साफ किया है कि भारत में किसी भी प्रकार के GMO चावल को व्यावसायिक खेती के लिए मंजूरी नहीं दी गई है. यानी भारत से जो भी चावल निर्यात किया जाता है, वह पूरी तरह नॉन-GMO होता है.

ICAR ने यह भी बताया कि भारत में चावल से जुड़ा कोई भी शोध GMO पर आधारित नहीं है. इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय चावल पूरी तरह सुरक्षित और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है. यही वजह है कि भारत लंबे समय से वैश्विक बाजार में भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता बना हुआ है.

निर्यातकों को कितना नुकसान हुआ

चीन के इस कदम से भारतीय निर्यातकों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है. कई चावल की खेपें चीनी बंदरगाहों पर रोक दी गईं या वापस लौटा दी गईं. इसके चलते निर्यातकों को डेमरेज चार्ज, अतिरिक्त माल ढुलाई और दूसरे बाजारों में माल भेजने का खर्च उठाना पड़ रहा है.

कई मामलों में कंपनियों को अपने माल को “बैक टू टाउन” करना पड़ा या दूसरे देशों में भेजना पड़ा, जिससे अनुबंध जोखिम बढ़ गया और व्यापार में अनिश्चितता पैदा हो गई. इससे छोटे और मध्यम निर्यातकों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है.

निर्यातकों की सरकार से मांग

इस पूरे मुद्दे को देखते हुए निर्यातकों ने सरकार से कई महत्वपूर्ण मांगें रखी हैं. उन्होंने कहा है कि भारत सरकार को चीन के कस्टम विभाग GACC के साथ राजनयिक स्तर पर बातचीत करनी चाहिए, ताकि GMO परीक्षण से जुड़ी समस्या का समाधान निकाला जा सके.

इसके अलावा, निर्यातकों ने यह भी मांग की है कि सरकार एक स्पष्ट व्यापार सलाह (ट्रेड एडवाइजरी) जारी करे, जिससे निर्यातकों को सही दिशा-निर्देश मिल सकें. उन्होंने यह भी कहा कि भारत के लोडिंग पोर्ट पर दिए जाने वाले नॉन-GMO सर्टिफिकेट को अंतिम और मान्य माना जाए, ताकि भविष्य में ऐसी समस्याएं न आएं. साथ ही, जब तक यह विवाद पूरी तरह सुलझ नहीं जाता, तब तक चीन के लिए नए निर्यात अनुबंधों के पंजीकरण को अस्थायी रूप से रोका जाए और प्रभावित निर्यातकों को राहत दी जाए.

क्या हो सकता है आगे

यह मामला केवल एक व्यापारिक विवाद नहीं है, बल्कि भारत-चीन व्यापार संबंधों पर भी असर डाल सकता है. यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो इससे भारतीय चावल निर्यात पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है. हालांकि, भारत का पक्ष मजबूत है क्योंकि देश में GMO चावल की खेती की अनुमति नहीं है. ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि सरकार इस मामले को गंभीरता से लेकर जल्द समाधान निकालेगी और निर्यातकों को राहत मिलेगी.

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Published: 28 Apr, 2026 | 07:45 AM
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