भारत ने चावल निर्यात नियमों में किया बड़ा बदलाव, अब रूस-तुर्की और अन्य देशों में तेजी से बढ़ेगा कारोबार

सरकार ने इस बार रणनीति के तहत गैर-EU यूरोपीय देशों को चुना है. दरअसल, EU देशों में सख्त नियमों और जांच प्रक्रियाओं के कारण निर्यात करना थोड़ा मुश्किल होता है. वहीं, रूस, तुर्की और अन्य देशों में यह प्रक्रिया आसान है और वहां मांग भी बढ़ रही है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 10 Apr, 2026 | 05:05 PM

Rice export policy: भारत ने चावल निर्यात को लेकर एक ऐसा फैसला लिया है, जो न सिर्फ व्यापार के लिहाज से अहम है, बल्कि किसानों और वैश्विक बाजार दोनों को राहत देंगे. 10 अप्रैल 2026 को सरकार ने कुछ खास यूरोपीय देशों के लिए चावल निर्यात के नियमों में ढील देने की घोषणा की. यह फैसला ऐसे समय आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में खाद्यान्न आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है.

क्या है यह नया बदलाव

सरकार ने फिलहाल छह महीनों के लिए चावल निर्यात में एक बड़ी राहत दी है. अब कुछ यूरोपीय देशों को चावल भेजने के लिए “एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन सर्टिफिकेट” की अनिवार्यता हटा दी गई है. पहले यह प्रमाण पत्र लेना जरूरी होता था, जिससे प्रक्रिया लंबी और थोड़ी महंगी हो जाती थी.

इस फैसले का फायदा बासमती और गैर-बासमती दोनों तरह के चावल के निर्यातकों को मिलेगा. खास बात यह है कि यह छूट यूरोपीय संघ (EU) के देशों पर लागू नहीं है, बल्कि रूस, तुर्की, यूक्रेन और बाल्कन क्षेत्र जैसे गैर-EU देशों के लिए दी गई है. इससे निर्यातकों की लागत कम होगी और उनका काम भी आसान हो जाएगा.

पहले क्यों लगी थीं पाबंदियां

कुछ समय पहले तक स्थिति बिल्कुल अलग थी. साल 2023 में सरकार ने चावल निर्यात पर कई सख्त कदम उठाए थे. उस समय देश में महंगाई बढ़ रही थी और पानी की कमी भी चिंता का कारण थी. इसी वजह से गैर-बासमती चावल के निर्यात पर रोक लगाई गई और बासमती के लिए न्यूनतम कीमत तय की गई.

लेकिन इन पाबंदियों के बावजूद भारत ने चावल निर्यात में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी. वित्त वर्ष 2024-25 में देश ने 11 अरब डॉलर से ज्यादा का चावल निर्यात किया. अफ्रीका और बांग्लादेश जैसे देशों में भारतीय चावल की मांग लगातार बनी रही. वहीं, दुनिया भर में चावल की कीमतें भी 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ गईं.

अब हालात क्यों बदले

अब स्थिति पहले से बेहतर दिख रही है. देश में अच्छा मानसून हुआ, जिससे उत्पादन बढ़ा और सरकारी भंडार भी मजबूत हुआ. अनुमान है कि 2025-26 में करीब 14 करोड़ टन चावल का उत्पादन हो सकता है, जो एक रिकॉर्ड स्तर होगा. साथ ही, सरकार के पास लगभग 6 करोड़ टन का बफर स्टॉक मौजूद है. इन सब कारणों से सरकार को भरोसा मिला है कि अब वह निर्यात बढ़ा सकती है, बिना देश की जरूरतों पर असर डाले.

नए बाजारों पर फोकस क्यों

सरकार ने इस बार रणनीति के तहत गैर-EU यूरोपीय देशों को चुना है. दरअसल, EU देशों में सख्त नियमों और जांच प्रक्रियाओं के कारण निर्यात करना थोड़ा मुश्किल होता है. वहीं, रूस, तुर्की और अन्य देशों में यह प्रक्रिया आसान है और वहां मांग भी बढ़ रही है. इसके अलावा, दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे तनाव और शिपिंग से जुड़ी दिक्कतों के चलते नए व्यापारिक रास्ते तलाशना जरूरी हो गया है. भारत इस मौके का फायदा उठाकर अपने निर्यात को और मजबूत करना चाहता है.

किसानों और अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा

इस फैसले से सबसे ज्यादा फायदा किसानों को मिलने की उम्मीद है, खासकर पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में. वहां खेती की लागत बढ़ रही है और ऐसे में बेहतर दाम मिलना किसानों के लिए जरूरी हो गया है.

निर्यात बढ़ने से देश को विदेशी मुद्रा भी ज्यादा मिलेगी. अनुमान है कि इससे 10 से 15 प्रतिशत तक निर्यात में बढ़ोतरी हो सकती है और करीब 500 मिलियन डॉलर की अतिरिक्त कमाई हो सकती है.

लेकिन कुछ चिंताएं भी हैं

हालांकि यह फैसला फायदेमंद है, लेकिन इसके साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं. अगर निर्यात बहुत तेजी से बढ़ता है, तो देश के अंदर चावल की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है और कीमतें बढ़ सकती हैं. पहले से ही महंगाई एक मुद्दा बनी हुई है, ऐसे में सरकार को बहुत संतुलन के साथ कदम उठाना होगा.

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