Punjab News: देश चावल उत्पादन में विश्व का सरताज बन गया है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 1501.8 लाख टन उत्पादन के साथ चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया है. वहीं, मौजूदा रबी सीजन (2025- 26) में गेहूं की बुआई का रकबा बढ़कर रिकॉर्ड 334.17 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है. दूसरी फसलों के कमजोर दामों के चलते किसान एक बार फिर गेहूं की ओर झुके हैं, जिससे बंपर पैदावार और निर्यात प्रतिबंधों में ढील की उम्मीद बढ़ी है. हालांकि यह उपलब्धि पहली नजर में बड़ी सफलता लगती है, लेकिन पंजाब के लिए यह खुशी से ज्यादा एक गंभीर संकट की चेतावनी है.
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, जो पंजाब कभी हरित क्रांति की रीढ़ था, आज वही राज्य अपनी ही पुरानी कृषि व्यवस्था में फंसा नजर आता है. 1960 के दशक में खाद्य सुरक्षा के लिए बनाई गई खेती की यह प्रणाली अब पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए टिकाऊ नहीं रही. पंजाब की खेती आज भी लगभग पूरी तरह गेहूं-धान के चक्र पर निर्भर है. ये दोनों फसलें मिलकर राज्य के कुल फसली क्षेत्र का करीब 85 फीसदी हिस्सा घेरे हुए हैं. इसकी बड़ी वजह सरकारी नीतियां हैं. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर सुनिश्चित खरीद, सिंचाई के लिए सस्ती या मुफ्त बिजली और मजबूत सरकारी खरीद ढांचा. बढ़ती लागत और अनिश्चित बाजार के बीच किसान वही उगाते हैं, जिसकी गारंटी सिस्टम देता है. इसी कारण फसल विविधीकरण की बातें वर्षों से होती रही हैं, लेकिन जमीन पर बदलाव नहीं दिखता.
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टिकाऊ खेती से पहले सुरक्षित विकल्प
सरकारें मक्का, दालें, तिलहन और बागवानी अपनाने की सलाह देती हैं, लेकिन इन फसलों में न तो दाम की गारंटी है और न ही पुख्ता खरीद व्यवस्था. बाजार भाव तेजी से गिरते-बढ़ते हैं, प्रोसेसिंग और भंडारण की सुविधाएं भी कमजोर हैं. ऐसे में किसानों के लिए विविधीकरण एक सुरक्षित बदलाव नहीं, बल्कि जोखिम भरा दांव बन जाता है. स्वाभाविक है कि किसान टिकाऊ खेती से पहले सुरक्षित विकल्प को चुनते हैं.
बिजली की खपत बढ़ रही है
इस खेती मॉडल की पर्यावरणीय कीमत अब नजरअंदाज नहीं की जा सकती. कम बारिश वाले पंजाब में धान की खेती ने भूजल स्तर को खतरनाक हद तक नीचे पहुंचा दिया है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के तीन-चौथाई से ज्यादा भूजल ब्लॉक अत्यधिक दोहन की श्रेणी में हैं. केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की रिपोर्ट बताती है कि देश में सबसे ज्यादा भूजल दोहन पंजाब में हो रहा है. कई जिलों में जलस्तर हर साल लगभग एक मीटर तक गिर रहा है. इसकी मुख्य वजह धान जैसी पानी की भारी मांग वाली फसल है. नतीजतन, ट्यूबवेल और गहरे किए जा रहे हैं, बिजली की खपत बढ़ रही है और खेती की लागत हर साल और महंगी होती जा रही है.
किसानों की आमदनी लगभग ठहरी हुई है
आर्थिक मोर्चे पर हालात उतने ही चिंताजनक हैं. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कीमतों में स्थिरता तो मिलती है, लेकिन किसानों की आमदनी लगभग ठहरी हुई है. बीज, खाद, डीजल और मजदूरी जैसे इनपुट खर्च तेजी से बढ़े हैं, जबकि मुनाफा उसी रफ्तार से नहीं बढ़ा. छोटे और सीमांत किसान, जिनके पास कम जमीन है और जो कर्ज पर ज्यादा निर्भर हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. पंजाब में हर साल किसानों की आत्महत्याओं के मामले सामने आते रहते हैं. यह साफ संकेत है कि सिर्फ सरकारी खरीद पर आधारित सुरक्षा से स्थायी खुशहाली नहीं आई.