ICAR की रिसर्च से खेती होगी और आसान, 25 फीसदी कम खाद में बेहतर गेहूं उत्पादन का दावा

ICAR ने गेहूं की फसल को रोगों से बचाने के लिए एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया है. देशभर में 30 से ज्यादा संस्थान मिलकर करीब 1 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की निगरानी कर रहे हैं. इस कार्यक्रम के तहत स्ट्राइप रस्ट, लीफ रस्ट और स्टेम रस्ट जैसे खतरनाक रोगों पर नजर रखी जाती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 9 Apr, 2026 | 02:08 PM

ICAR wheat research: आज के समय में खेती करना पहले जितना आसान नहीं रह गया है. मौसम का मिजाज लगातार बदल रहा है- कभी तेज बारिश, कभी सूखा और कभी अचानक तापमान में बदलाव. ऐसे में किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वे कम खर्च में अच्छी पैदावार कैसे लें. इसी बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की नई रिसर्च किसानों के लिए राहत और उम्मीद दोनों लेकर आई है.

जलवायु के अनुसार खेती की जरूरत

आज के समय में मौसम पहले जैसा स्थिर नहीं रहा. कभी बारिश ज्यादा होती है तो कभी बिल्कुल नहीं होती, जिससे फसल पर सीधा असर पड़ता है. ऐसे में ICAR ने ऐसी तकनीकों पर काम किया है, जो खेती को मौसम के अनुसार ढालने में मदद करती हैं.

करनाल स्थित संस्थानों में चल रहे शोध की समीक्षा के दौरान डॉ. एम. एल. जाट ने बताया कि इस साल गेहूं उत्पादन बेहतर रहने की संभावना है. इसका मतलब है कि अगर सही तकनीक अपनाई जाए तो बदलते मौसम के बावजूद भी अच्छी पैदावार ली जा सकती है.

उर्वरक में 25 फीसदी तक बचत संभव

खेती में सबसे बड़ा खर्च उर्वरकों पर आता है. ICAR की नई तकनीक, जिसे BNI (Biological Nitrification Inhibition) कहा जाता है, के जरिए किसान उर्वरकों के उपयोग में करीब 25 फीसदी तक कमी कर सकते हैं. इस तकनीक से मिट्टी में नाइट्रोजन का सही उपयोग होता है, जिससे फसल को पूरा पोषण मिलता है और अतिरिक्त खाद की जरूरत नहीं पड़ती. इससे लागत घटती है और पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है.

संरक्षण कृषि से कई फायदे

ICAR ने संरक्षण कृषि (Conservation Agriculture) पर भी खास जोर दिया है. इस पद्धति में मिट्टी को ज्यादा नुकसान पहुंचाए बिना खेती की जाती है.

इसके अच्छे नतीजे सामने आए हैं. इस तरीके से सिंचाई के पानी में 85 फीसदी तक बचत हुई है. उर्वरक का उपयोग भी करीब 28 फीसदी कम हुआ है. सबसे बड़ी बात यह है कि फसल अवशेष जलाने की घटनाएं लगभग 95 फीसदी तक कम हो गई हैं, जिससे प्रदूषण भी घटा है. इसके अलावा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी 46 फीसदी तक कम हुआ है, जो पर्यावरण के लिए बेहद जरूरी है.

किसानों की आय में बढ़ोतरी

इन सभी तकनीकों का सबसे बड़ा फायदा किसानों को मिल रहा है. जब लागत कम होती है और उत्पादन बेहतर होता है, तो सीधा असर किसानों की आय पर पड़ता है. ICAR के अनुसार, इन उपायों को अपनाने से किसानों की आय लगभग दोगुनी तक बढ़ सकती है. यह खेती को एक फायदे का सौदा बनाने की दिशा में बड़ा कदम है.

मिट्टी की सेहत में सुधार

लगातार एक ही तरीके से खेती करने से मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो जाती है. लेकिन नई तकनीकों से मिट्टी की सेहत में भी सुधार देखा गया है. मिट्टी में कार्बनिक कार्बन की मात्रा बढ़ी है और सूक्ष्मजीवों की संख्या भी दोगुनी हुई है. इससे मिट्टी ज्यादा उपजाऊ बनती है और लंबे समय तक अच्छी पैदावार देती है.

रोगों से सुरक्षा के लिए निगरानी

ICAR ने गेहूं की फसल को रोगों से बचाने के लिए एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया है. देशभर में 30 से ज्यादा संस्थान मिलकर करीब 1 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की निगरानी कर रहे हैं.

इस कार्यक्रम के तहत स्ट्राइप रस्ट, लीफ रस्ट और स्टेम रस्ट जैसे खतरनाक रोगों पर नजर रखी जाती है. हर साल 1000 से ज्यादा नई किस्मों का परीक्षण किया जाता है, ताकि किसानों को सुरक्षित और मजबूत बीज मिल सकें.

नई किस्में और पोषण पर ध्यान

ICAR ने अब तक 55 ऐसी गेहूं की किस्में विकसित की हैं, जिनमें आयरन, जिंक और प्रोटीन की मात्रा ज्यादा है. इन किस्मों की खेती अब देश के लगभग 45 फीसदी क्षेत्र में हो रही है. इससे न सिर्फ उत्पादन बढ़ रहा है, बल्कि लोगों को बेहतर पोषण भी मिल रहा है.

जौ की खेती को भी बढ़ावा

ICAR जौ (Barley) की खेती को भी आगे बढ़ा रहा है. यह फसल कम पानी और कम उर्वरक में भी अच्छी पैदावार देती है. इसके साथ ही यह स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है और बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है. आने वाले समय में जौ टिकाऊ खेती का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है.

किसानों के लिए बड़ा मौका

नई तकनीकों और शोध के जरिए खेती अब पहले से ज्यादा आसान और लाभदायक बन रही है. अगर किसान इन आधुनिक तरीकों को अपनाते हैं, तो वे कम लागत में ज्यादा उत्पादन हासिल कर सकते हैं और मौसम की अनिश्चितता से भी बच सकते हैं.

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