भारत का झींगा (Shrimp) निर्यात इस साल बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है. क्रिसिल रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका द्वारा आयात शुल्क (टैरिफ) को 58 फीसदी से अधिक करने के कारण झींगा निर्यात की मात्रा में करीब 15-18 फीसदी तक की गिरावट देखने को मिल सकती है. इसका सीधा असर निर्यातकों की आमदनी और किसानों की आय पर पड़ेगा.
भारत और अमेरिका का जुड़ाव
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में भारत ने लगभग 5 बिलियन डॉलर मूल्य के झींगे का निर्यात किया था, जिसमें अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 48 फीसदी रही. अमेरिका लंबे समय से भारतीय झींगा निर्यातकों के लिए पसंदीदा बाजार रहा है, क्योंकि वहां बेहतर मुनाफा और बार-बार खरीदारों की मांग बनी रहती है. लेकिन अब बढ़ा हुआ शुल्क इस संतुलन को बिगाड़ रहा है.
किसानों और उद्योग पर असर
क्रिसिल रेटिंग्स के वरिष्ठ निदेशक राहुल गुआ ने कहा कि इस स्थिति का असर सिर्फ प्रोसेसिंग कंपनियों पर ही नहीं, बल्कि किसानों पर भी पड़ेगा। झींगा पालने वाले किसान पहले से ही बीज, चारा और जमीन किराए पर लेने में काफी पैसा लगाते हैं। अगर निर्यात कम हुआ और कीमतें गिरीं, तो उनकी मेहनत और खर्च दोनों पर सीधा असर पड़ेगा।
घटती कमाई और लाभ
रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार पिछले चार साल से झींगा निर्यात से मिलने वाली आमदनी स्थिर बनी हुई थी. लेकिन अब राजस्व में 18-20 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है. साथ ही, मुनाफे का मार्जिन भी 150-200 बेसिस पॉइंट तक कम हो सकता है. इससे कंपनियों की वित्तीय स्थिति और कर्ज चुकाने की क्षमता भी कमजोर होगी.
नए बाजार की तलाश
हालांकि संकट के बीच भारतीय समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA) ने नए बाजार तलाशने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं. एमपीईडीए अध्यक्ष डीवी स्वामी ने बताया कि पहले से ही वियतनाम और जापान में व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भेजे जा चुके हैं, जबकि इस समय चीन में भी वार्ता चल रही है. यूरोपीय संघ और जापान से मिले शुरुआती संकेत उत्साहजनक बताए जा रहे हैं.
उद्योग की मांग
सीफूड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सचिव-जनरल के.एन. राघवन ने कहा कि अगर यह ऊंचा टैक्स ढांचा बरकरार रहता है तो निर्यातकों को मजबूरी में अन्य बाजारों की ओर रुख करना होगा. उन्होंने कहा कि भारतीय समुद्री भोजन की गुणवत्ता को दुनिया भर में मान्यता प्राप्त है और स्थिरता से जुड़ी कोई समस्या नहीं है. इसलिए यह संकट अस्थायी साबित हो सकता है.
लेकिन, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस समय निर्यातकों को नकदी प्रवाह की दिक्कत हो रही है. अचानक अमेरिकी बाजार में निर्यात ठप हो जाने से कंपनियों को घाटा उठाना पड़ रहा है. ऐसे में सरकार और बैंकिंग संस्थानों का सहयोग बेहद जरूरी है, ताकि उद्योग इस कठिन दौर से निकल सके.
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अमेरिका का टैक्स लंबे समय तक बना रहा, तो भारत को नए बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी ही होगी. हालांकि, यह चुनौतीपूर्ण है, लेकिन भारतीय समुद्री खाद्य उद्योग पहले भी कई मुश्किलों को पार कर चुका है. उम्मीद है कि इस बार भी झींगा उद्योग सही रणनीति और सरकारी मदद के सहारे इस संकट से उबर जाएगा.