पोल्ट्री फार्मिंग बनी खतरे की घंटी! तेजी से फैल रहा खतरनाक बैक्टीरिया, स्टडी में बड़ा खुलासा

नई स्टडी के मुताबिक, तेजी से बढ़ रही औद्योगिक पोल्ट्री फार्मिंग से कैंपिलोबैक्टर बैक्टीरिया का संक्रमण तेजी से फैल रहा है. शोध में पाया गया कि जंगली पक्षियों और पोल्ट्री फार्मों के बीच इसका फैलाव 100 गुना से ज्यादा बढ़ा है. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इससे एंटीबायोटिक प्रतिरोध बढ़ने और इंसानों में खाद्य जनित डायरिया का खतरा भी बढ़ सकता है.

Kisan India
नोएडा | Published: 31 Jul, 2026 | 04:23 PM

दुनियाभर में तेजी से बढ़ रही औद्योगिक पोल्ट्री फार्मिंग को लेकर एक नई स्टडी में चिंता जताई गई है. शोध के अनुसार, इससे कैंपिलोबैक्टर बैक्टीरिया का संक्रमण तेजी से फैल रहा है. यह बैक्टीरिया खाद्य जनित डायरिया (दस्त) का सबसे बड़ा कारण माना जाता है और इंसानों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है. 27 जुलाई 2026 को वैज्ञानिक पत्रिका पीएनएएस (PNAS) में प्रकाशित इस अध्ययन में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 1979 से 2024 के बीच 30 देशों से इकट्ठा किए गए करीब 2,800 बैक्टीरिया के जीनोम का विश्लेषण किया. ये नमूने मुर्गियों और जंगली पक्षियों से लिए गए थे.

शोध का नेतृत्व करने वाले वैज्ञानिकों के अनुसार, औद्योगिक पोल्ट्री उत्पादन बढ़ने से जंगली पक्षियों और व्यावसायिक पोल्ट्री फार्मों के बीच कैंपिलोबैक्टर बैक्टीरिया का फैलाव 100 गुना से अधिक बढ़ गया है. इससे बैक्टीरिया तेजी से विकसित हो रहा है और उसमें एंटीबायोटिक दवाओं के असर से बचने (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) जैसी नई विशेषताएं भी विकसित हो रही हैं.

पोल्ट्री फार्मों में बैक्टीरिया आसानी से एक पक्षी से दूसरे पक्षी में फैलते हैं

शोधकर्ताओं का कहना है कि बड़े पैमाने पर होने वाली पोल्ट्री और पशुपालन प्रणाली सिर्फ बैक्टीरिया की संख्या ही नहीं बढ़ा रही, बल्कि उन्हें तेजी से बदलने और अधिक खतरनाक बनने का मौका भी दे रही है. बड़े और घनी आबादी वाले पोल्ट्री फार्मों में बैक्टीरिया आसानी से एक पक्षी से दूसरे पक्षी में फैलते हैं और नई प्रजातियों में भी पहुंच जाते हैं. इससे इंसानों तक संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है.

बैक्टीरिया को अपने भीतर पनपने और फैलने का मौका देते हैं

अध्ययन के अनुसार, अधिक संख्या में मुर्गियों वाले फार्म कई तरह के बैक्टीरिया को अपने भीतर पनपने और फैलने का मौका देते हैं. इससे अलग-अलग बैक्टीरिया एक साथ मौजूद रहते हैं और उनमें नए गुण विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है. शोध में यह भी पाया गया कि मुर्गियों में पाए जाने वाले कई कैंपिलोबैक्टर बैक्टीरिया ऐसे जीन विकसित कर रहे हैं, जो उन्हें तनावपूर्ण परिस्थितियों में जीवित रहने, तेजी से फैलने और एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम करने में मदद करते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे बदलाव खाद्य श्रृंखला के जरिए इंसानों तक संक्रमण पहुंचने और बैक्टीरिया के लंबे समय तक शरीर में टिके रहने का खतरा बढ़ा सकते हैं.

बदलावों से संक्रामक बीमारियों का फैलाव बढ़ रहा है

शोधकर्ताओं का कहना है कि इंसानों की गतिविधियों और पर्यावरण में हो रहे बदलावों से संक्रामक बीमारियों का फैलाव बढ़ रहा है. अध्ययन के सह-लेखक सैमुअल के. शेपर्ड ने कहा कि जैसे-जैसे दुनिया में मुर्गियों की संख्या बढ़ी है, वैसे-वैसे पहले केवल जंगली पक्षियों तक सीमित रहने वाले कैंपिलोबैक्टर बैक्टीरिया को पोल्ट्री फार्मों में फैलने और स्थायी रूप से मौजूद रहने का अधिक मौका मिला है. मार्च 2026 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की एक अन्य स्टडी में भी पाया गया था कि दस्त की बीमारी फैलाने वाले इस बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध (AMR) बढ़ रहा है. अध्ययन के अनुसार, ब्रिटेन के ऑक्सफोर्डशायर में इंसानों में होने वाले करीब 80 फीसदी कैंपिलोबैक्टर संक्रमण पोल्ट्री मांस से जुड़े हैं और इनमें से कई मामलों में एंटीबायोटिक दवाएं कम असरदार हो रही हैं.

मुर्गियों की संख्या करीब सात गुना बढ़कर 31 अरब तक पहुंच गई

शोधकर्ताओं के मुताबिक, 1960 के दशक के बाद दुनिया में मुर्गियों की संख्या करीब सात गुना बढ़कर 31 अरब तक पहुंच गई है. उनका कहना है कि बढ़ती औद्योगिक पोल्ट्री फार्मिंग और वैश्विक पशु व्यापार का संक्रामक बीमारियों पर क्या असर पड़ रहा है, इसे समझना लोगों की सेहत की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है. हर साल दुनिया में करीब 55 करोड़ लोग, जिनमें 5 साल से कम उम्र के 22 करोड़ बच्चे भी शामिल हैं, खाद्य जनित डायरिया से प्रभावित होते हैं और इसका सबसे बड़ा बैक्टीरियल कारण कैंपिलोबैक्टर है.

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