National Bamboo Mission: खेती में बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और पारंपरिक फसलों में घटते मुनाफे के बीच किसान अब ऐसे विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, जिनसे कम मेहनत में अच्छी आय हो सके. ऐसे समय में बांस की खेती किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है. यही वजह है कि बांस को अक्सर ‘हरा सोना’ भी कहा जाता है. एक बार पौधे लगाने के बाद कई वर्षों तक इससे लगातार कमाई की जा सकती है.
किसानों को बांस की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के लिए केंद्र सरकार राष्ट्रीय बांस मिशन (National Bamboo Mission) चला रही है. इस योजना के तहत किसानों को पौधे लगाने और खेती शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता भी दी जाती है.
क्या है राष्ट्रीय बांस मिशन?
राष्ट्रीय बांस मिशन का उद्देश्य देश में बांस के उत्पादन को बढ़ावा देना और इससे जुड़े उद्योगों को मजबूत करना है. सरकार चाहती है कि किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ बांस जैसी व्यावसायिक फसलों को भी अपनाएं, ताकि उनकी आय बढ़ सके. यह योजना उन किसानों के लिए भी फायदेमंद मानी जाती है जिनके पास ऐसी जमीन है जहां सामान्य फसलों का उत्पादन अच्छा नहीं होता. बंजर या कम उपजाऊ जमीन पर भी बांस की खेती आसानी से की जा सकती है.
किसानों को मिलती है सब्सिडी
बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार किसानों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है. योजना के तहत पौधारोपण और अन्य शुरुआती खर्चों पर सब्सिडी दी जाती है. कई मामलों में कुल लागत का लगभग 50 प्रतिशत तक हिस्सा सरकार देती है. इससे किसानों पर शुरुआती निवेश का बोझ काफी कम हो जाता है. योजना के तहत मिलने वाली सहायता सीधे किसानों के बैंक खाते में भेजी जाती है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है. इस सरकारी मदद का लाभ छोटे और सीमांत किसान भी उठा सकते हैं और कम पूंजी में बांस की खेती शुरू कर सकते हैं.
बांस की खेती क्यों है मुनाफे का सौदा?
बांस उत्पादों का वैश्विक बाजार लगातार बढ़ रहा है. साल 2018 में बांस से जुड़े उत्पादों का ग्लोबल एक्सपोर्ट करीब 2.9 अरब डॉलर था, जिसमें 2025 तक हर साल लगभग 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान है. भारत में भी बांस और बेंत उद्योग तेजी से आगे बढ़ा है. जहां 2018-19 में बांस का निर्यात 720 करोड़ रुपये था, वहीं 2023-24 तक यह बढ़कर 1,163 करोड़ रुपये हो गया. इस दौरान आयात में भी कमी दर्ज की गई, जिससे घरेलू किसानों को फायदा हुआ है.
क्यों बढ़ रही है बांस की खेती की लोकप्रियता?
बांस की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें अन्य फसलों की तुलना में कम देखभाल की जरूरत होती है. इसे बार-बार सिंचाई, महंगे उर्वरकों या अधिक मजदूरी की आवश्यकता नहीं होती. किसान चाहें तो खेत की मेढ़ों पर भी बांस लगा सकते हैं. इससे मुख्य फसल पर कोई खास असर नहीं पड़ता और अतिरिक्त आय का सोर्स तैयार हो जाता है.
इसके अलावा बांस का पौधा एक बार लगाने के बाद कई सालों तक उत्पादन देता रहता है. कटाई के बाद उसी जड़ से नए पौधे निकल आते हैं, जिससे बार-बार पौधे खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती.
बांस से कैसे होती है कमाई?
बांस की मांग देशभर में लगातार बढ़ रही है. इसका उपयोग फर्नीचर बनाने, अगरबत्ती उद्योग, कागज उद्योग, निर्माण कार्य और सजावटी सामान तैयार करने में किया जाता है. बढ़ती मांग के कारण किसानों को इसका अच्छा बाजार मिल जाता है. आमतौर पर पौधारोपण के तीन से चार साल बाद बांस कटाई के लिए तैयार हो जाता है. इसके बाद नियमित अंतराल पर कटाई कर आय प्राप्त की जा सकती है. सही प्रबंधन और उचित बाजार मिलने पर किसान बांस की खेती से हर साल अच्छी कमाई कर सकते हैं.