बारामती में केले के दाम गिरकर 2-3 रुपये किलो, मजबूर किसान ने खेत में ही जोत दी पूरी फसल

बारामती क्षेत्र पहले गन्ने की खेती के लिए जाना जाता था, लेकिन गन्ने के दामों में कमी आने के बाद कई किसानों ने केले की खेती शुरू की थी. उन्हें लगा था कि यह फसल ज्यादा लाभ देगी. लेकिन अब केले के दामों में भी भारी गिरावट ने किसानों को संकट में डाल दिया है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 15 Apr, 2026 | 02:19 PM

Banana price crash: देश में खेती अब कई किसानों के लिए फायदे का सौदा नहीं रह गई है, बल्कि एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है. महाराष्ट्र के बारामती से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने पूरे कृषि तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं. यहां एक किसान ने केले की फसल को बाजार में बेचने के बजाय खेत में ही जोत देने का फैसला लिया, क्योंकि उसे लागत के मुकाबले बेहद कम दाम मिल रहे थे.

लोकमत की खबर के अनुसार, यह मामला बारामती तालुका के होळ गांव के किसान किशोर कारंडे से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी मेहनत से उगाई गई पूरी फसल को मिट्टी में मिला दिया. उनका कहना है कि जब बाजार में केले का दाम सिर्फ 2 से 3 रुपये प्रति किलो मिल रहा था, तो इसे बेचने से बेहतर था कि इसे खेत में ही छोड़ दिया जाए.

लागत ज्यादा, लेकिन कीमत बेहद कम

किशोर कारंडे ने अपने एक एकड़ खेत में केले की खेती की थी. इस फसल को तैयार करने में उन्होंने करीब डेढ़ लाख से लेकर करीब दो लाख रुपये तक खर्च किए थे. इसमें पौधे, खाद, दवाइयां और मजदूरी जैसे कई खर्च शामिल थे.

शुरुआत में बाजार में केले के दाम ठीक-ठाक थे और किसानों को उम्मीद थी कि उन्हें अच्छा मुनाफा मिलेगा. कुछ समय पहले तक केले की कीमत 25 से 30 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थी, जिससे किसानों में उम्मीद जगी थी कि इस बार उन्हें अच्छा लाभ होगा.

अचानक कैसे गिर गए दाम

लेकिन यह खुशी ज्यादा समय तक नहीं टिक पाई. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते तनाव, खासकर अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच युद्ध जैसी स्थिति का असर सीधे कृषि निर्यात पर पड़ा. निर्यात में रुकावट आने लगी और इसका सीधा असर बाजार भाव पर देखने को मिला.

धीरे-धीरे केले के दाम गिरकर 20-22 रुपये से 10-12 रुपये तक आ गए. लेकिन स्थिति यहीं नहीं रुकी. कुछ ही समय में व्यापारी किसानों से सिर्फ 2-3 रुपये किलो के हिसाब से केले खरीदने की बात करने लगे. इस कीमत पर किसान अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहे थे, ऐसे में किशोर कारंडे ने बड़ा फैसला लेते हुए पूरी फसल को खेत में ही जोत दिया.

किसान का दर्द और गुस्सा

खबर के अनुसार, किशोर कारंडे का कहना है कि इतनी कम कीमत पर फसल बेचने से अच्छा है कि उसे खेत में ही मिलाकर जमीन को खाद बना दिया जाए. उन्होंने साफ कहा कि इससे कम से कम मिट्टी को फायदा होगा, लेकिन व्यापारी मुनाफा नहीं कमा पाएंगे. उनकी यह बात किसानों के अंदर बढ़ती नाराजगी को भी दिखाती है, जो बाजार व्यवस्था और दामों की अनिश्चितता से परेशान हैं.

बारामती में बदलती खेती की तस्वीर

बारामती क्षेत्र पहले गन्ने की खेती के लिए जाना जाता था, लेकिन गन्ने के दामों में कमी आने के बाद कई किसानों ने केले की खेती शुरू की थी. उन्हें लगा था कि यह फसल ज्यादा लाभ देगी. लेकिन अब केले के दामों में भी भारी गिरावट ने किसानों को संकट में डाल दिया है. लगातार बदलते बाजार भाव और अनिश्चितता के कारण किसानों के सामने बड़ी आर्थिक समस्या खड़ी हो गई है.

बाजार व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

jरिपोर्ट के अनुसार, किसानों का कहना है कि बाजार में कीमत तय करने की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है. उन्हें उचित मूल्य नहीं मिल पाता और वे व्यापारियों पर निर्भर हो जाते हैं. कई बार व्यापारी अपनी मर्जी से कम दाम तय कर देते हैं, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है. इसके अलावा मौसम में बदलाव, अचानक बारिश और फसलों में रोग लगने जैसी समस्याएं भी उत्पादन को प्रभावित कर रही हैं. इससे लागत बढ़ रही है, लेकिन आमदनी घट रही है.

बढ़ता आर्थिक संकट

इस पूरी स्थिति का असर किसानों की आर्थिक स्थिति पर साफ दिख रहा है. कर्ज बढ़ता जा रहा है और कई किसान आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं. ऐसे में खेती करना उनके लिए और भी मुश्किल होता जा रहा है.

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