India fertiliser import: भारत में खेती की मजबूती काफी हद तक उर्वरकों पर निर्भर करती है, लेकिन अब यही उर्वरक देश के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं. बढ़ती आयात निर्भरता, सब्सिडी का भारी बोझ और खाद के असंतुलित उपयोग ने कृषि व्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है. ऐसे में अब विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि भारत को उर्वरकों के मामले में आत्मनिर्भर बनना ही होगा, और इसके लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लेना जरूरी है.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक एम. एल. जाट ने इस दिशा में एक बड़ा रोडमैप सुझाया है. उन्होंने कहा कि भारत को अल्पकाल, मध्यमकाल और दीर्घकालीन रणनीति बनाकर उर्वरकों के आयात पर निर्भरता कम करनी होगी. इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), प्रिसिजन फार्मिंग और सेंसर आधारित तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाना बेहद जरूरी है.
हरित क्रांति से अब नई चुनौती तक
इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार, भारत में हरित क्रांति के समय उर्वरकों ने उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी. लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि उर्वरकों का उपयोग सही तरीके से नहीं हो रहा. किसान कई बार जरूरत से ज्यादा या गलत अनुपात में खाद डालते हैं, जिससे न सिर्फ लागत बढ़ती है बल्कि मिट्टी की सेहत भी खराब होती है.
एम. एल. जाट के अनुसार, अब समय आ गया है कि खाद के इस्तेमाल को वैज्ञानिक और संतुलित बनाया जाए. इसके लिए किसानों को जागरूक करना और सही जानकारी देना बेहद जरूरी है.
सॉयल हेल्थ कार्ड और संतुलित उपयोग पर जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि सॉयल हेल्थ कार्ड जैसी योजनाओं को और मजबूत करने की जरूरत है. इससे किसानों को यह पता चलता है कि उनकी जमीन में कौन-से पोषक तत्व की कमी है और कितनी मात्रा में खाद डालनी चाहिए.
अगर किसान जरूरत के अनुसार खाद का इस्तेमाल करेंगे, तो उत्पादन भी बेहतर होगा और लागत भी कम होगी. इसके साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता भी लंबे समय तक बनी रहेगी.
AI और प्रिसिजन टेक्नोलॉजी से होगा बदलाव
अब खेती में नई तकनीकों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेंसर और डेटा आधारित सिस्टम का उपयोग करके खेतों में खाद का सही मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है.
‘भारत विस्तार’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए किसानों तक नई तकनीक पहुंचाई जा सकती है, जिससे वे बेहतर फैसले ले सकें. इससे खाद का बेकार इस्तेमाल कम होगा और उत्पादन बढ़ेगा.
जैविक और वैकल्पिक उपायों पर भी ध्यान
केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहना अब सही नहीं माना जा रहा. विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि जैविक खाद, कंपोस्ट और अन्य प्राकृतिक विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए. इसके साथ ही फसल चक्र (Crop Diversification) में बदलाव कर दालों और तिलहनों की खेती बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है. इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और रासायनिक खाद की जरूरत कम होती है.
आयात और सब्सिडी का बढ़ता बोझ
भारत में उर्वरकों पर सरकार का खर्च लगातार बढ़ रहा है. 2024-25 में यह सब्सिडी करीब 1.71 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई. इसकी बड़ी वजह आयात पर निर्भरता है, खासकर फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्वों के लिए. इसके अलावा यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली लगभग 80 फीसदी प्राकृतिक गैस भी आयात करनी पड़ती है. यानी घरेलू उत्पादन होने के बावजूद पूरी तरह आत्मनिर्भरता अभी दूर है.
उपयोग में असंतुलन और नुकसान
एक और बड़ी समस्या यह है कि खेतों में डाली गई खाद का पूरा लाभ फसलों को नहीं मिल पाता. आंकड़ों के अनुसार, नाइट्रोजन का सिर्फ 30-50 फीसदी, फॉस्फोरस का 15-25 फीसदी और पोटाश का 50-60 फीसदी ही फसल उपयोग कर पाती है. बाकी खाद पानी में बह जाती है या मिट्टी में बेकार हो जाती है. इससे न सिर्फ पैसा बर्बाद होता है, बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है.
नीतियों में बदलाव की जरूरत
विशेषज्ञों ने कहा है कि अब उर्वरक नीतियों में बड़े बदलाव की जरूरत है. यूरिया को भी न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी के तहत लाना चाहिए. साथ ही सब्सिडी को अच्छे कृषि अभ्यास (GAP) अपनाने से जोड़ना चाहिए. यह भी सुझाव दिया गया है कि सब्सिडी सीधे किसानों के खाते में दी जाए, ताकि वे जरूरत के अनुसार सही निर्णय ले सकें.