कश्मीर के किसानों की चमकी किस्मत, विदेशी चेरी से मिल रहे दोगुने दाम और बढ़ रही कमाई!

कश्मीर में चेरी की खेती तेजी से बदल रही है. किसान नई और उन्नत विदेशी किस्मों को अपनाकर बेहतर उत्पादन और ज्यादा कमाई हासिल कर रहे हैं. सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीकों और बेहतर बाजार सुविधाओं का लाभ मिलने से चेरी कारोबार को नई रफ्तार मिली है, जिससे किसानों में उत्साह बढ़ा है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 19 Jun, 2026 | 05:39 PM

Cherry Farming: कश्मीर घाटी में चेरी की खेती तेजी से बदल रही है. अब किसान पारंपरिक किस्मों की जगह विदेशी और ज्यादा उपज देने वाली चेरी की खेती कर रहे हैं. नई तकनीक और सघन बागवानी (हाई-डेंसिटी प्लांटेशन) की मदद से कम जमीन में ज्यादा पौधे लगाए जा रहे हैं. इसका फायदा यह हो रहा है कि किसानों को बेहतर गुणवत्ता की फसल मिल रही है और बाजार में पहले से ज्यादा कीमत भी मिल रही है.

विदेशी किस्मों से बढ़ी किसानों की आमदनी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, श्रीनगर, गांदरबल और शोपियां जैसे प्रमुख चेरी उत्पादक  इलाकों में कई किसानों ने विदेशी किस्मों को अपनाया है. इनमें रजिना, कॉर्डिया, लैपिन, अरेको, सैंटिना और स्वीट सरेटा जैसी किस्में शामिल हैं. किसानों का कहना है कि इन चेरी की बाजार में काफी मांग है. मौजूदा समय में विदेशी चेरी की एक किलो पैकिंग 400 से 500 रुपये तक बिक रही है, जबकि पारंपरिक चेरी की कीमत 200 से 400 रुपये प्रति किलो के बीच रहती है. इससे किसानों की आय में अच्छा इजाफा हुआ है और वे नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं.

हाई-डेंसिटी बागवानी से मिल रहे बेहतर नतीजे

सरकार की विभिन्न योजनाओं की मदद से किसान अब सघन बागवानी की ओर बढ़ रहे हैं. इस तकनीक में कम जगह में ज्यादा पौधे लगाए जाते हैं, जिससे उत्पादन बढ़ता है. इसके साथ ही पेड़ों पर जल्दी फल आते हैं और फलों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है. जम्मू-कश्मीर के कृषि उत्पादन  मंत्री जावीद अहमद डार के अनुसार, इस बदलाव से न केवल पैदावार बढ़ी है बल्कि किसानों की पहुंच देश के बड़े और प्रीमियम बाजारों तक भी बनी है. आंकड़ों के मुताबिक, कश्मीर में करीब 2,952.91 हेक्टेयर क्षेत्र में चेरी की खेती होती है और हर साल लगभग 23,230.59 मीट्रिक टन उत्पादन होता है.

125 करोड़ रुपये की परियोजना से मिलेगा बड़ा लाभ

चेरी उद्योग को और मजबूत बनाने के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार गांदरबल और बारामूला जिलों में चेरी क्लस्टर विकास परियोजना  चला रही है. 125.93 करोड़ रुपये की इस परियोजना से करीब 4,000 किसानों को फायदा मिलने की उम्मीद है. इस योजना के तहत बेहतर पौधे, वैज्ञानिक खेती, जैविक उत्पादन, आधुनिक भंडारण, पैकेजिंग और मार्केटिंग जैसी सुविधाओं पर जोर दिया जा रहा है. सरकार का लक्ष्य उत्पादन बढ़ाने के साथ किसानों की आय में भी वृद्धि करना है.

बेहतर परिवहन से कम हुआ फसल का नुकसान

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, चेरी जैसी नाजुक फसल के लिए तेज परिवहन बहुत जरूरी होता है. रेलवे और एयर कार्गो सेवाओं की मदद से अब चेरी को जल्दी बाजारों तक पहुंचाया जा रहा है. इससे फलों के खराब होने की समस्या  कम हुई है. रेलवे अधिकारियों के अनुसार, इस सीजन में करीब 250 टन चेरी मुंबई, सूरत और वडोदरा जैसे बड़े शहरों तक भेजी गई है. बेहतर परिवहन सुविधाओं के कारण किसानों को अपनी फसल का अच्छा दाम मिल रहा है और नुकसान भी कम हो रहा है.

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