कश्मीर में केसर उत्पादन गिरा, साही के हमलों और मौसम ने मिलकर किसानों की बढ़ाई मुश्किलें

विशेषज्ञों का मानना है कि साही के हमलों के पीछे एक बड़ी वजह वनों की कटाई है. जंगल कम होने से ये जानवर अपने प्राकृतिक आवास से बाहर निकलकर खेतों की ओर आ रहे हैं. पंपोर और आसपास के इलाके, जो भारत में केसर उत्पादन का मुख्य केंद्र हैं, अब इन जानवरों के लिए आसान निशाना बन गए हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 16 Apr, 2026 | 07:49 AM

Kashmir saffron farming: कश्मीर की पहचान माने जाने वाले केसर की खेती इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रही है. पहले ही जलवायु परिवर्तन ने किसानों की कमर तोड़ दी थी, और अब एक नई समस्या ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के पंपोर इलाके में केसर किसानों को इन दिनों साही (पोर्क्यूपाइन) के हमलों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनकी फसल को भारी नुकसान हो रहा है.

जड़ों से फसल को नुकसान पहुंचा रहा साही

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, साही एक ऐसा जानवर है जो जमीन के अंदर मौजूद केसर के कंद (Corms) को खाकर फसल को जड़ से ही नष्ट कर देता है. केसर के पौधे एक बार लगाने के बाद 5 से 7 साल तक चलते हैं, लेकिन साही के हमलों की वजह से किसानों को हर साल दोबारा रोपाई करनी पड़ रही है.

पंपोर के किसान अली मोहम्मद बताते हैं कि साही का हमला दिसंबर से अप्रैल के बीच सबसे ज्यादा होता है. यही वह समय होता है जब फसल को सबसे ज्यादा नुकसान होता है.

हर साल 20-25 फीसदी तक नुकसान

किसानों के मुताबिक, साही के कारण हर साल लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक फसल का नुकसान हो रहा है. यह नुकसान पहले से ही घटते उत्पादन के बीच किसानों के लिए बड़ा झटका साबित हो रहा है. जावेद अहमद जैसे किसान बताते हैं कि पहले ही उत्पादन कम हो रहा था, और अब इस नए खतरे ने खेती को और मुश्किल बना दिया है.

क्यों बढ़ रहे हैं साही के हमले

विशेषज्ञों का मानना है कि साही के हमलों के पीछे एक बड़ी वजह वनों की कटाई है. जंगल कम होने से ये जानवर अपने प्राकृतिक आवास से बाहर निकलकर खेतों की ओर आ रहे हैं. पंपोर और आसपास के इलाके, जो भारत में केसर उत्पादन का मुख्य केंद्र हैं, अब इन जानवरों के लिए आसान निशाना बन गए हैं.

केसर उत्पादन में लगातार गिरावट

कभी कश्मीर का केसर दुनियाभर में मशहूर था और यहां अच्छी पैदावार होती थी. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं.
1997-98 में जहां केसर उत्पादन 15.97 टन था, वहीं 2021-22 में यह घटकर 3.48 टन रह गया. 2024 तक यह आंकड़ा और गिरकर सिर्फ 2.6 टन रह गया है.

इस गिरावट के पीछे कई कारण हैं जैसे बर्फबारी में कमी, सिंचाई की कमजोर व्यवस्था और खेती की जमीन का शहरीकरण में बदलना.

किसानों के पास सीमित उपाय

इस समस्या से निपटने के लिए किसान अपने स्तर पर कई उपाय कर रहे हैं. वे जैविक रिपेलेंट, नेफ्थलीन की गोलियां और खेतों की निगरानी जैसे तरीके अपनाते हैं. लेकिन इन उपायों से ज्यादा फायदा नहीं हो पा रहा है. कुछ जगहों पर साही को पकड़ने के लिए पिंजरे भी लगाए गए हैं, लेकिन इसमें भी सफलता सीमित ही रही है.

कानून भी बना बाधा

एक और बड़ी समस्या यह है कि साही जम्मू-कश्मीर में संरक्षित प्रजाति है. ऐसे में किसानों के पास इसे नियंत्रित करने के बहुत कम विकल्प हैं. वे इसे नुकसान नहीं पहुंचा सकते, जिससे फसल बचाना और मुश्किल हो जाता है.

समाधान की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या का स्थायी समाधान सामूहिक प्रयासों से ही संभव है. खेतों के चारों ओर मजबूत बाड़ लगाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है, जिसे कई किसान मिलकर कर सकते हैं. इसके अलावा वैज्ञानिक तरीके, बेहतर योजना और सरकार की मदद से ही इस संकट को कम किया जा सकता है.

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