पुराने नियमों से परेशान जम्मू-कश्मीर के किसान, अखरोट की आधुनिक खेती में कानून बना बाधा

राज्य के बागवानी विभाग ने 2021 में ही सुझाव दिया था कि इस कानून में संशोधन किया जाना चाहिए, ताकि किसान पुराने पेड़ों को हटाकर नई तकनीक अपना सकें. इसी दिशा में मार्च 2021 में हाई-डेंसिटी प्लांटेशन योजना भी शुरू की गई थी, जिसे इस क्षेत्र के लिए गेम-चेंजर माना जा रहा था.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 2 Apr, 2026 | 09:33 AM

Walnut farming: जम्मू-कश्मीर में अखरोट सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि हजारों किसानों की रोजी-रोटी का सहारा है. यहां हर साल करीब 3.5 लाख टन अखरोट पैदा होता है, जो पूरे देश का लगभग 90 प्रतिशत है. लेकिन अब वक्त बदल रहा है और किसान भी खेती के नए तरीकों को अपनाना चाहते हैं. समस्या यह है कि एक पुराना कानून इस बदलाव के रास्ते में बड़ी दीवार बनकर खड़ा हो गया है.

पुराने कानून से किसानों की बढ़ी परेशानी

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, राज्य में लागू “जम्मू-कश्मीर प्रिजर्वेशन ऑफ स्पेसिफाइड ट्रीज एक्ट” के तहत अखरोट और चिनार जैसे पेड़ों को काटने पर सख्त रोक है. यह कानून पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से बनाया गया था, लेकिन अब किसान इसे अपनी प्रगति में रुकावट मानने लगे हैं.

सरकार का नेतृत्व कर रहे उमर अब्दुल्ला ने इस कानून में बदलाव के प्रस्ताव का विरोध किया है. उनका कहना है कि यह कानून पर्यावरण और पारंपरिक पेड़ों की सुरक्षा के लिए जरूरी है. हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अगर पेड़ काटने के साथ अनिवार्य रूप से नए पौधे लगाए जाएं, तो इस पर विचार किया जा सकता है.

हाई-डेंसिटी खेती क्यों है जरूरी?

आज के समय में पारंपरिक अखरोट के पेड़ों से उत्पादन लेना किसानों के लिए चुनौती बनता जा रहा है. ये पेड़ फल देने में 10 से 13 साल तक का समय लेते हैं और इनके लिए ज्यादा जमीन की जरूरत होती है. छोटे किसानों के लिए यह मॉडल ज्यादा फायदेमंद नहीं रह गया है.

इसके मुकाबले हाई-डेंसिटी यानी घनी खेती में लगाए जाने वाले नए पौधे सिर्फ 4 से 5 साल में फल देना शुरू कर देते हैं. इन्हें कम दूरी पर लगाया जा सकता है, जिससे प्रति हेक्टेयर उत्पादन कई गुना बढ़ जाता है. यही वजह है कि किसान इस नई तकनीक को अपनाना चाहते हैं.

किसानों की बढ़ती मांग

दक्षिण कश्मीर के कई किसान मानते हैं कि अगर उन्हें पुराने पेड़ों को हटाकर नई किस्मों के पौधे लगाने की अनुमति मिल जाए, तो उनकी आय में बड़ा सुधार हो सकता है. उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में बागान बिखरे हुए हैं और उत्पादन में भी काफी समय लगता है.

किसानों का यह भी कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से उनकी कमाई पर असर पड़ रहा है. चिली, चीन और अमेरिका के कैलिफोर्निया जैसे बड़े निर्यातक देशों से मुकाबला करना अब मुश्किल होता जा रहा है. ऐसे में अगर आधुनिक खेती को बढ़ावा नहीं मिला, तो कश्मीर के पारंपरिक अखरोट उद्योग को नुकसान हो सकता है.

सरकार की योजनाएं और जमीनी हकीकत

राज्य के बागवानी विभाग ने 2021 में ही सुझाव दिया था कि इस कानून में संशोधन किया जाना चाहिए, ताकि किसान पुराने पेड़ों को हटाकर नई तकनीक अपना सकें. इसी दिशा में मार्च 2021 में हाई-डेंसिटी प्लांटेशन योजना भी शुरू की गई थी, जिसे इस क्षेत्र के लिए गेम-चेंजर माना जा रहा था.

इस योजना के तहत किसानों को बेहतर किस्म के पौधे, आधुनिक तकनीक और प्रबंधन की सुविधा दी जा रही है, जिससे उत्पादन बढ़ाया जा सके. इसके अलावा केंद्र सरकार ने भी 2026-27 के बजट में उच्च मूल्य वाली फसलों जैसे अखरोट, बादाम और पाइन नट्स के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा है.

बदलाव की रफ्तार पर असर

हालांकि सरकार की योजनाएं कागजों पर मजबूत दिखती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर पुराने कानून के कारण इनका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है. किसान मानते हैं कि जब तक उन्हें अपने खेतों में बदलाव करने की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, तब तक आधुनिक खेती की ओर पूरी तरह बढ़ना मुश्किल रहेगा.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

ज्ञान का सम्मान क्विज

आम में सबसे ज्यादा कौन सा विटामिन होता है?

सवाल का दीजिए सही जवाब और जीतिए ₹1000 का इनाम! 🏆
पिछले Quiz का सही जवाब
कपास
विजेताओं के नाम
कमल सिंह पडिहार, आगर मालवा, मध्य प्रदेश
गुरबाज सिंह, रोपड़, पंजाब

लेटेस्ट न्यूज़