औषधीय खेती का सुपरहिट फॉर्मूला, किसानों के लिए मुलेठी बना पैसा छापने की मशीन- ऐसे करें शुरुआत

मुलेठी को अलग-अलग इलाकों में यष्टिमधु, मधुयष्टि और लिकोरिस के नाम से भी जाना जाता है. भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी इसकी जड़ों की अच्छी कीमत मिलती है. अगर किसान थोड़ी समझदारी और सही तकनीक के साथ इसकी खेती करें, तो यह फसल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 27 Jan, 2026 | 04:33 PM

Farming Tips: आज के समय में खेती सिर्फ अनाज तक सीमित नहीं रह गई है. अब किसान औषधीय और आयुर्वेदिक फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं, क्योंकि इनमें लागत कम और मुनाफा ज्यादा होता है. ऐसी ही एक खास औषधीय फसल है मुलेठी, जिसे आयुर्वेद में अमृत समान माना जाता है. गले की खराश से लेकर पेट और त्वचा की समस्याओं तक, मुलेठी का इस्तेमाल हर जगह होता है. यही वजह है कि बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है और किसानों के लिए यह फसल कमाई का सुनहरा मौका बनती जा रही है.

मुलेठी को अलग-अलग इलाकों में यष्टिमधु, मधुयष्टि और लिकोरिस के नाम से भी जाना जाता है. भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी इसकी जड़ों की अच्छी कीमत मिलती है. अगर किसान थोड़ी समझदारी और सही तकनीक के साथ इसकी खेती करें, तो यह फसल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकती है.

मुलेठी का पौधा कैसा होता है

मुलेठी एक झाड़ीदार पौधा होता है, जिसकी ऊंचाई आमतौर पर एक से डेढ़ मीटर तक होती है. इसके पत्ते हरे और फूल हल्के बैंगनी या गुलाबी रंग के होते हैं. हालांकि इस पौधे की सबसे कीमती चीज इसके ऊपर नहीं, बल्कि जमीन के अंदर होती है. इसकी जड़ें ही असली खजाना हैं, जिनका इस्तेमाल दवाइयों, चूर्ण, सिरप, कफ सिरप और सौंदर्य उत्पादों में किया जाता है. जड़ें स्वाद में हल्की मीठी होती हैं और इनमें कई औषधीय गुण पाए जाते हैं.

किस जलवायु और मिट्टी में होती है बेहतर पैदावार

मुलेठी की खेती भारत के ज्यादातर हिस्सों में की जा सकती है. इसे गर्म और हल्की ठंडी जलवायु पसंद होती है. ज्यादा पाला या बहुत अधिक बारिश इस फसल के लिए नुकसानदायक हो सकती है. मिट्टी की बात करें तो बलुई दोमट या रेतीली दोमट मिट्टी मुलेठी के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है. मिट्टी का पीएच मान 6 से 8 के बीच हो तो जड़ों का विकास बेहतर होता है. खेत में पानी का जमाव बिल्कुल नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे जड़ें सड़ सकती हैं.

खेत की तैयारी क्यों है जरूरी

अच्छी फसल के लिए खेत की सही तैयारी बहुत जरूरी होती है. मुलेठी की खेती से पहले खेत की गहरी जुताई की जाती है, ताकि पुरानी फसल के अवशेष और खरपतवार पूरी तरह खत्म हो जाएं. इसके बाद 2-3 बार हल्की जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाया जाता है. आखिरी जुताई के समय अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है. खेत को समतल कर जल निकासी की व्यवस्था जरूर करनी चाहिए.

रोपाई कैसे करें ताकि पौधा मजबूत बने

मुलेठी की खेती बीज से नहीं, बल्कि इसकी जड़ों से की जाती है. रोपाई के लिए 7 से 9 इंच लंबी स्वस्थ जड़ों का चयन किया जाता है, जिनमें कम से कम 3 से 4 आंखें हों. इन्हीं आंखों से नए पौधे निकलते हैं. जड़ों को कतारों में लगाया जाता है और पौधों के बीच उचित दूरी रखी जाती है, ताकि जड़ों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके. जड़ का कुछ हिस्सा मिट्टी के बाहर रखना जरूरी होता है.

सिंचाई और देखभाल से बढ़ता है उत्पादन

रोपाई के बाद हल्की सिंचाई की जाती है, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे. शुरुआती दिनों में पौधे को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन गर्मी के मौसम में समय-समय पर सिंचाई जरूरी हो जाती है. बरसात में अतिरिक्त पानी निकालने का इंतजाम होना चाहिए. खेत को खरपतवार से साफ रखना भी जरूरी है, ताकि पौधों को पूरा पोषण मिल सके.

कब होती है खुदाई और कितनी होती है कमाई

मुलेठी की खेती धैर्य मांगती है, क्योंकि इसकी जड़ें पूरी तरह तैयार होने में लगभग तीन साल का समय लेती हैं. तीन साल बाद जड़ों की खुदाई की जाती है. इन्हें साफ करके धूप में सुखाया जाता है और फिर बाजार में बेचा जाता है. सही देखभाल करने पर प्रति एकड़ 30 से 35 क्विंटल तक सूखी जड़ों की पैदावार मिल सकती है. बाजार में मुलेठी की अच्छी कीमत मिलने के कारण किसान इससे लाखों रुपये की कमाई कर सकते हैं.

कम लागत, भरोसेमंद मुनाफा

आज जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, ऐसे समय में मुलेठी जैसी औषधीय फसल किसानों के लिए राहत बन सकती है. कम रसायन, कम सिंचाई और लंबी अवधि में बेहतर मुनाफा इसे खास बनाता है. सही जानकारी और धैर्य के साथ की गई मुलेठी की खेती सच में किसानों की जिंदगी बदल सकती है.

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