वैज्ञानिकों ने तैयार की मक्का की नई किस्म PMH-17.. प्रति एकड़ 25 क्विंटल होगी पैदावार

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की नई हाइब्रिड मक्का किस्म PMH-17 कम पानी में बेहतर उत्पादन देने का दावा करती है. यह अनाज और साइलेज दोनों के लिए उपयुक्त है. राज्य सरकार इसे फसल विविधीकरण और भूजल संरक्षण के लिए बढ़ावा दे रही है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह किस्म किसानों की आय बढ़ाने में भी मददगार साबित हो सकती है.

Kisan India
नोएडा | Published: 1 Jun, 2026 | 11:14 AM

Maize Farming: पंजाब में फसल विविधीकरण और भूजल बचाने के लिए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) ने मक्का की नई हाइब्रिड किस्म PMH-17 विकसित की है. यह किस्म खरीफ सीजन के लिए तैयार की गई है. कृषि विभाग किसानों को धान के कुछ क्षेत्र में PMH-17 की खेती करने की सलाह दे रहा है. इससे कम पानी में खेती होगी और भूजल संरक्षण में मदद मिलेगी. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि PMH-17 हाइब्रिड मक्का की खेती में पारंपरिक धान की तुलना में काफी कम पानी की जरूरत होती है. इससे भूजल संरक्षण में मदद मिलेगी और किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने का बेहतर विकल्प मिलेगा. सरकार को उम्मीद है कि इससे पानी की बचत के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब में खरीफ सीजन के लिए आधिकारिक तौर पर अनुशंसित मक्का  का रकबा केवल 2.5 लाख एकड़ है. इसके विपरीत, कृषि विशेषज्ञों की चेतावनियों के बावजूद गर्मियों में उगाई जाने वाली गैर-अनुशंसित मक्का की खेती 6 से 7 लाख एकड़ में की जा रही है. इस मक्का का उपयोग मुख्य रूप से साइलेज (पशुओं के लिए पौष्टिक चारा) बनाने में होता है.

PMH-17 किस्म की खासियत

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, PMH-17 पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) द्वारा विकसित पहली ऐसी दोहरे उपयोग वाली हाइब्रिड मक्का किस्म  है, जिसका इस्तेमाल अनाज उत्पादन और साइलेज दोनों के लिए किया जा सकता है. यह किस्म अधिक उपज देने के साथ-साथ डेयरी क्षेत्र की चारे की जरूरतों को भी पूरा कर सकती है. इसे पूरे पंजाब में खेती के लिए अनुशंसित किया गया है और माना जा रहा है कि यह राज्य के फसल विविधीकरण कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.

96 दिनों में फसल तैयार हो जाएगी

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के वैज्ञानिकों के अनुसार, PMH-17 हाइब्रिड मक्का की फसल करीब 96 दिनों में तैयार हो जाती है. अनुशंसित खेती तकनीकों को अपनाने पर यह प्रति एकड़ लगभग 25 क्विंटल अनाज उत्पादन देने की क्षमता रखती है. यह किस्म विभिन्न प्रकार की मिट्टी और अलग-अलग कृषि-जलवायु परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार देने में सक्षम पाई गई है. PAU की प्रमुख मक्का प्रजनक (मेज ब्रीडर) डॉ. सुरिंदर कौर संधू ने कहा कि PMH-17 को अपनाने से किसानों की उत्पादकता बढ़ सकती है और उन्हें बेहतर आर्थिक लाभ मिल सकता है. साथ ही, यह किस्म कम पानी में अच्छी पैदावार देकर प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर भूजल, के संरक्षण में भी मदद करेगी.

साइलेज डेयरी में होगा इस्तेमाल

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, PMH-17 पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) द्वारा विकसित पहली दोहरे उपयोग वाली हाइब्रिड मक्का किस्म है. इसका इस्तेमाल अधिक अनाज उत्पादन के साथ-साथ साइलेज बनाने के लिए भी किया जा सकता है. साइलेज डेयरी क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाला पौष्टिक पशु चारा है. इस किस्म को पूरे पंजाब में खेती के लिए मंजूरी दी गई है और इसे राज्य के फसल विविधीकरण कार्यक्रम को मजबूत करने में अहम माना जा रहा है.

किसी भी मिट्टी में कर सकते हैं खेती

PAU की वैज्ञानिक डॉ. सुरिंदर कौर संधू ने कहा कि फील्ड परीक्षणों में PMH-17 ने विभिन्न प्रकार की मिट्टी में अच्छे परिणाम दिए हैं. उन्होंने कहा कि यह किस्म किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ फसल पैटर्न  में बदलाव लाने और भूजल पर बढ़ते दबाव को कम करने में भी मदद करेगी. राज्य कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, 2020 के बाद से पंजाब में साइलेज बनाने वाली इकाइयों की संख्या तेजी से बढ़ी है. डेयरी उद्योग में इसकी बढ़ती मांग के कारण कई किसान गर्मी और वसंत सीजन में मक्का की खेती कर अतिरिक्त आय कमा रहे हैं. ऐसे में PMH-17 जैसी नई किस्म किसानों के लिए बेहतर और लाभकारी विकल्प साबित हो सकती है.

भूजल का कम होगा दोहन

कृषि विभाग के अधिकारियों ने चिंता जताई है कि गर्मी और सूखे के महीनों में मक्का की खेती से भूजल पर अतिरिक्त दबाव  पड़ता है. ऐसे में PMH-17 किस्म किसानों को खरीफ सीजन में मक्का उगाने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है, क्योंकि इस दौरान बारिश फसल की पानी की जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा कर देती है. PAU की वैज्ञानिक डॉ. सुरिंदर कौर संधू ने कहा कि PMH-17 के दानों में 65 प्रतिशत से अधिक स्टार्च होता है. इससे इसकी बाजार में मांग बढ़ सकती है और यह एथेनॉल उद्योग के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है. विश्वविद्यालय के अनुसार, इस किस्म की खेती के लिए प्रति एकड़ लगभग 10 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. इसके बीज पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और राज्य के कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) पर 240 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से उपलब्ध हैं.

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