पंजाब-हरियाणा में सफल अभियान, 88 फीसदी कृषि भूमि बची, 8 गांव बने पूरी तरह पराली मुक्त

पंजाब और हरियाणा में एचडीएफसी बैंक की ‘परिवर्तन’ पहल ने पराली जलाने पर रोक लगाने में बड़ी सफलता हासिल की है. 3.78 लाख एकड़ में से 88 फीसदी क्षेत्र को पराली जलाने से बचाया गया. 380 से अधिक गांवों के 86,000 किसानों ने इस अभियान में भाग लिया, जिससे प्रदूषण कम हुआ और किसानों को आर्थिक लाभ भी मिला.

Kisan India
नोएडा | Published: 6 Jun, 2026 | 09:30 PM

Stubble Management: पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की समस्या को कम करने के लिए चलाए गए एक अभियान को बड़ी सफलता मिली है. एचडीएफसी बैंक की कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) पहल ‘परिवर्तन’ के तहत वर्ष 2025 में 3.78 लाख एकड़ कृषि भूमि में से करीब 88 प्रतिशत क्षेत्र को पराली जलाने से बचाया गया. कंपनी की ओर से जारी बयान के अनुसार, यह कार्यक्रम भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) फाउंडेशन के सहयोग से चलाया जा रहा है. इस पहल के तहत पंजाब के लुधियाना और संगरूर तथा हरियाणा के फतेहाबाद जिले के 380 से अधिक गांवों के करीब 86,000 किसानों तक पहुंच बनाई गई.

यह तीन वर्षीय कार्यक्रम अक्टूबर 2023 में लुधियाना से शुरू किया गया था. बाद में वर्ष 2024 में इसका विस्तार संगरूर और फतेहाबाद  तक किया गया. अब तक इस अभियान के तहत आठ गांवों ने पराली जलाने की प्रथा पूरी तरह बंद कर दी है, जबकि 174 गांवों में 90 प्रतिशत से अधिक किसानों ने पराली नहीं जलाने के नियम का पालन किया है. संस्था ने इसे फसल अवशेष प्रबंधन (क्रॉप रेजिड्यू मैनेजमेंट) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है, जिससे पर्यावरण संरक्षण और वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिली है.

पराली जलाना किसानों की आदत नहीं

एचडीएफसी बैंक की सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी) प्रमुख नुसरत पठान ने ‘बिजनेसलाइन’ से कहा कि पराली जलाना केवल किसानों की आदत का मामला नहीं है, बल्कि यह आर्थिक, तकनीकी सुविधाओं और जागरूकता से जुड़ी एक बड़ी समस्या है. उन्होंने बताया कि एचडीएफसी बैंक की ‘परिवर्तन’ पहल और सीआईआई फाउंडेशन की साझेदारी ने इन तीनों चुनौतियों पर एक साथ काम किया है.

बैंकों के माध्यम से कृषि मशीनें उपलब्ध कराई गईं

नुसरत पठान के अनुसार, किसानों को सहकारी टूल बैंकों के माध्यम से कृषि मशीनें  उपलब्ध कराई गईं, लगातार जागरूकता अभियान चलाकर व्यवहार में बदलाव लाने की कोशिश की गई और पराली के निपटान के लिए बायोगैस तथा कंपोस्टिंग जैसे वैकल्पिक समाधान भी उपलब्ध कराए गए. इससे न केवल पर्यावरण को फायदा हुआ, बल्कि किसानों की लागत भी कम हुई और उन्हें आर्थिक लाभ मिला. उन्होंने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर संस्था इस पहल को और बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि अधिक से अधिक किसान पराली जलाने के बजाय पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपना सकें.

सीआईआई फाउंडेशन में जलवायु लचीलापन (क्लाइमेट रेजिलिएंस) कार्यक्रम के प्रमुख चंद्रकांत प्रधान ने कहा कि इस अभियान की सबसे बड़ी सफलता किसानों की सक्रिय भागीदारी और जिम्मेदारी है. उन्होंने कहा कि जो किसान पहले पराली जलाने को मजबूरी मानते थे, वे अब खेत में ही पराली प्रबंधन (इन-सीटू मैनेजमेंट) को बढ़ावा दे रहे हैं और दूसरे किसानों को भी इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं.

पराली जलाने के केस काफी हद तक हुए कम

उन्होंने कहा कि लुधियाना, संगरूर और फतेहाबाद के कई गांवों में किसानों ने पिछले कुछ वर्षों में पराली जलाने की पुरानी  प्रथा को काफी हद तक छोड़ दिया है. सिर्फ दो से तीन साल के भीतर बड़ी संख्या में किसान ‘जीरो बर्निंग’ यानी पराली न जलाने के अभियान का हिस्सा बन गए हैं. चंद्रकांत प्रधान के अनुसार, यह बदलाव इस बात का उदाहरण है कि जब समुदायों को सही संसाधन, जानकारी और नेतृत्व का अवसर दिया जाता है, तो वे सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. उन्होंने कहा कि किसानों की जागरूकता और सहयोग से पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान संभव है.

 

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Published: 6 Jun, 2026 | 09:30 PM

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