गन्ना किसानों के लिए ठंड और बदलता मौसम मुसीबत बन गया है. सिंचाई कर चुके किसानों के लिए हल्की बूंदाबांदी और फुहारों से मुश्किल बढ़ गई है. क्योंकि, अधिक नमी से खरपतवार की समस्या बढ़ जाती है, जिससे पौधे की ग्रोथ पर बुरा असर पड़ता है. वहीं, दूसरी ओर बढ़वार के वक्त फसल में रेड रॉट और स्मॉट रोग फैलने का खतरा भी बढ़ गया है. पश्चिमी यूपी, शाहजहांपुर के अलावा महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में इन बीमारियों का प्रकोप दिख रहा है.
गन्ने की फसल में सर्दियों में क्या ध्यान रखें
सर्दियों में गन्ने की बढ़वार धीमी हो जाती है, इसलिए खेत में नमी बनाए रखना जरूरी होता है, लेकिन जलभराव नहीं होना चाहिए. ठंड से बचाव के लिए समय-समय पर हल्की सिंचाई करनी चाहिए और खेत को खरपतवार मुक्त रखना चाहिए. पाले की आशंका वाले क्षेत्रों में फसल के आसपास धुआं करना या सिंचाई करना लाभदायक रहता है. साथ ही, इस मौसम में कीट-रोगों की निगरानी करते रहना चाहिए ताकि शुरुआती अवस्था में ही नियंत्रण किया जा सके.
गन्ने की फसल में रेड रॉट बीमारी क्या है
उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के प्रसार ब्यूरो के कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार रेड रॉट गन्ने की घातक फफूंदजनित बीमारी है, जिसे कोलेटोट्रिकम फालकैटम नामक फफूंद फैलाता है. इस रोग में गन्ने की डंठल को चीरने पर अंदर का गूदा लाल रंग का दिखाई देता है, जिस पर सफेद आड़ी धारियां (क्रॉस लाइंस) साफ नजर आती हैं. प्रभावित पौधे धीरे-धीरे सूखने लगते हैं, पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और अंत में पूरा पौधा मर सकता है. यह रोग बीज गन्ने, संक्रमित खेत और नमी-भरे वातावरण से तेजी से फैलता है.
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रेड रॉट बीमारी से फसल को बचाने के देसी और वैज्ञानिक उपाय
देसी उपायों में सबसे पहले रोगग्रस्त पौधों को खेत से उखाड़कर नष्ट करना चाहिए और स्वस्थ बीज गन्ने का ही उपयोग करना चाहिए. बुवाई से पहले बीज गन्ने को गर्म पानी (लगभग 50°C) में 30 मिनट तक उपचारित करना भी लाभकारी होता है. वैज्ञानिक उपायों में रोग प्रतिरोधी किस्मों की खेती, खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था और संतुलित खाद का प्रयोग जरूरी है. आवश्यकता पड़ने पर बीज गन्ने को कार्बेन्डाजिम या थायोफेनेट मिथाइल जैसे फफूंदनाशकों के घोल से उपचारित कर बोना चाहिए.
गन्ने की फसल में होने वाले प्रमुख रोग
गन्ने में रेड रॉट के अलावा स्मट रोग, टॉप रॉट, विल्ट, ग्रास शूट रोग और लीफ स्काल्ड जैसे प्रमुख रोग पाए जाते हैं. ये रोग फसल की उपज और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करते हैं. इनसे बचाव के लिए रोग-मुक्त बीज, फसल चक्र अपनाना, संतुलित पोषण और समय पर रोग नियंत्रण उपाय करना बेहद आवश्यक है.