आंध्र प्रदेश के चित्तूर और तिरुपति जिलों में गन्ने की खेती में भारी गिरावट आई है. कभी रायालसीमा क्षेत्र में गन्ने की खेती के बड़े केंद्र रहे अविभाजित चित्तूर जिले में 2013 के बाद से व्यावसायिक गन्ने का रकबा 96 फीसदी से ज्यादा घट गया है. अब दोनों जिलों में कुल मिलाकर सिर्फ 4,835 हेक्टेयर में व्यावसायिक गन्ने की खेती हो रही है. यह अपने सबसे अच्छे दौर के मुकाबले महज 3-4 फीसदी रह गई है.
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस गिरावट के पीछे चीनी मिलों का बंद होना, सहकारी व्यवस्था की कमजोरी और पड़ोसी राज्यों की निजी चीनी मिलों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसे कारण हैं. एक समय अविभाजित चित्तूर में छह बड़ी चीनी मिलें चलती थीं, जिनसे एक लाख से ज्यादा किसान परिवार जुड़े हुए थे. मिलों के बंद होने से इस पूरे इलाके की गन्ना आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है. चित्तूर और तिरुपति जिलों में गन्ने की खेती घटने के साथ चीनी मिलों की स्थिति भी खराब हो गई है. चित्तूर को-ऑपरेटिव शुगर्स और गजुलामंड्यम की श्री वेंकटेश्वर को-ऑपरेटिव शुगर्स पूरी तरह बंद हैं. इन मिलों को दोबारा शुरू करने के बजाय सरकार अब उनकी संपत्तियों से कमाई और कानूनी प्रक्रिया के जरिए पुराने कर्ज निपटाने पर ध्यान दे रही है.
मिलें बंद होने से किसानों का भुगतान अटका
निजी क्षेत्र की मिलों की स्थिति भी बेहतर नहीं रही. नाटेम्स शुगर्स 2020 के गन्ना पेराई सीजन के बाद अचानक बंद हो गई. इससे हजारों किसानों के करोड़ों रुपये के बकाये का भुगतान अटक गया. इसी तरह बी.एन. कंद्रिगा की सुदालागुंटा शुगर्स और पुंगनूर की केबीडी शुगर्स भी लगातार घाटे के कारण बंद हो गईं. फिलहाल नेलावॉय की SNJ शुगर्स ही इस इलाके में चालू है. चित्तूर और तिरुपति जिलों के गन्ना अधिकारी एम. मुथ्याला नायडू के मुताबिक, मिल ने करीब 4,800 हेक्टेयर की फसल की पेराई करने पर सहमति दी है. इसकी क्षमता करीब 3,800 मीट्रिक टन चीनी उत्पादन की है.
स्थानीय मिलें बंद होने से बढ़ा संकट
चित्तूर और तिरुपति जिलों में स्थानीय चीनी मिलों के बंद होने से बचे हुए गन्ना किसानों की मुश्किलें बढ़ गईं. इलाके में पेराई की पर्याप्त सुविधा नहीं होने के कारण किसानों को अपनी फसल तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा से लगे निजी चीनी मिलों तक भेजनी पड़ रही है. वेदुरुकुप्पम के तीसरी पीढ़ी के किसान सुरपराजू उदय कुमार राजू ने बताया कि गन्ना दूसरे राज्यों की मिलों तक पहुंचाने में डीजल और अंतरराज्यीय परिवहन परमिट पर इतना खर्च हो रहा था कि FRP से मिलने वाली रकम भी कम पड़ने लगी. उन्होंने बताया कि सीमा पार की मिलों में गन्ने का भाव ठीक मिलता था, लेकिन परिवहन खर्च के कारण खेती करना मुश्किल हो गया.
गन्ने से दूरी की बड़ी वजह बनी बंद चीनी मिलें
वहीं, स्थानीय चीनी मिलों के बंद होने से हजारों किसानों ने गन्ने की खेती छोड़कर दूसरे विकल्प अपनाए हैं. कई किसान डेयरी और पशुपालन की ओर चले गए हैं, जबकि कुछ ने धान, मक्का और टमाटर जैसी कम अवधि वाली फसलों की खेती शुरू कर दी है. विशेषज्ञों का कहना है कि यहां मिट्टी अब भी गन्ने के लिए उपयुक्त है, लेकिन मिलें नहीं चलने के कारण किसान 10 महीने की फसल में पैसा लगाने से बच रहे हैं.