Tips For Farmers: उत्तर भारत में इन दिनों कड़ाके की ठंड और गिरते तापमान ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. शीतलहर और पाले का सीधा असर न सिर्फ फसलों पर पड़ता है, बल्कि पशुपालन और दुग्ध उत्पादन पर भी इसका असर देखने को मिलता है. इसी को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश कृषि विभाग ने किसानों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है. विभाग का कहना है कि अगर ठंड के मौसम में समय पर सिंचाई, निराई-गुड़ाई, खाद प्रबंधन और रोग-कीट नियंत्रण किया जाए, तो नुकसान से बचते हुए उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है.
गेहूं, जौ और दलहनी फसलों की देखभाल
गेहूं की फसल में दूसरी सिंचाई बुवाई के 40-45 दिन बाद, जब कल्ले निकल रहे हों, करनी चाहिए. वहीं तीसरी सिंचाई 60-65 दिन बाद गांठ बनने की अवस्था में लाभकारी रहती है. चूहों से बचाव के लिए जिंक फास्फाइड से बने चारे या एल्युमिनियम फास्फाइड की टिकिया का प्रयोग किया जा सकता है.
जौ की फसल में दूसरी सिंचाई 55-60 दिन बाद गांठ बनने की अवस्था पर करें. चना और जौ में उकठा रोग से बचाव के लिए बुवाई से पहले ट्राइकोडर्मा को सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर भूमि शोधन करना उपयोगी माना गया है.
मटर, सरसों और मक्का के लिए सलाह
- मटर की फसल में पाउडरी मिल्ड्यू रोग ठंड में तेजी से फैलता है. इसकी रोकथाम के लिए घुलनशील गंधक का 10-12 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें.
- राई-सरसों में दाना भरने की अवस्था पर दूसरी सिंचाई जरूरी है. माहू कीट के नियंत्रण के लिए अनुशंसित कीटनाशक का पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें.
- शीतकालीन मक्का में 40-45 दिन बाद निराई-गुड़ाई कर खरपतवार निकालें और समय पर दूसरी व तीसरी सिंचाई जरूर करें.
गन्ना, बरसीम और सब्जियों की खेती
- शरदकालीन गन्ना: गन्ने की फसल में जरूरत के हिसाब से पानी देते रहें अगर तनाछेदक कीट दिखे तो समय रहते सही दवा का छिड़काव करें, ताकि फसल खराब न हो
- बरसीम की फसल: बरसीम की कटाई और सिंचाई 20 से 25 दिन के अंतर से करें इससे फसल अच्छी रहेगी और हरा चारा ज्यादा मिलेगा
- आलू, टमाटर और मिर्च: इन सब्जियों में पिछेती झुलसा नाम की बीमारी से बचाने के लिए फफूंदनाशक दवा का छिड़काव करना जरूरी है, वरना फसल को नुकसान हो सकता है
फलों, फूलों और सगंध पौधों की देखभाल
फलदार बागों में निराई-गुड़ाई और साफ-सफाई करें. आम, अमरूद, पपीता और लीची के बागों में समय पर सिंचाई जरूरी है. आंवला के पौधों में उम्र के अनुसार गोबर खाद और उर्वरकों का संतुलित प्रयोग करें. गुलाब और मेंथा की खेती में निराई-गुड़ाई और रोपाई के कार्य समय पर पूरे करें.
पशुपालन और मुर्गी पालन में सावधानी
ठंड के मौसम में पशुओं को टाट या बोरे से ढककर रखें और पशुशाला को सूखा रखें. दाने की मात्रा बढ़ाएं और आवश्यक टीकाकरण जरूर कराएं. वहीं अंडा देने वाली मुर्गियों को संतुलित लेयर फीड देने के साथ चूजों को पर्याप्त गर्मी और रोशनी उपलब्ध कराना जरूरी है.