गांवों में फैल रही है खतरनाक बीमारी, गाय-भैंस अचानक दूध देना कर देती हैं बंद.. जानें बचाव के उपाय
पशुओं में तेजी से फैलने वाली खुरपका-मुंहपका बीमारी से बचाव के लिए मुफ्त टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है. पशुपालकों को सलाह दी गई है कि सभी दुधारू पशुओं को समय पर टीका लगवाएं, ताकि दूध उत्पादन सुरक्षित रहे और आर्थिक नुकसान से बचाव हो सके. इससे गांवों में पशुओं की सेहत बेहतर बनी रहती.
Animal Health: गांव में सुबह-सुबह जब पशुपालक अपने पशुओं को चारा डालने जाते हैं और देखते हैं कि पशु सुस्त खड़ा है, दूध भी कम हो गया है और मुंह-पैर में घाव जैसे निशान दिख रहे हैं, तो चिंता बढ़ जाती है. पशुओं की सेहत सीधे परिवार की आमदनी से जुड़ी होती है. ऐसे ही खतरे से बचाने के लिए इन दिनों पशुओं को इस गंभीर बीमारी से सुरक्षित रखने का विशेष टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है, ताकि पशु स्वस्थ रहें और पशुपालकों की कमाई पर असर न पड़े.
खुरपका-मुंहपका बीमारी क्यों है खतरनाक
पशुओं में फैलने वाली खुरपका-मुंहपका बीमारी बहुत तेजी से फैलती है. यह बीमारी गाय-भैंस जैसे दुधारू पशुओं के लिए बेहद नुकसानदायक मानी जाती है. बीमारी होने पर पशु के मुंह और पैरों में छाले पड़ जाते हैं और तेज बुखार आ जाता है. धीरे-धीरे पशु चारा खाना कम कर देता है और दूध देना भी घट जाता है. कई बार हालत इतनी खराब हो जाती है कि पशु पूरी तरह दूध देना बंद कर देता है. अगर समय पर इलाज न मिले तो पशु कमजोर होकर गंभीर स्थिति में पहुंच सकता है. यही वजह है कि पशुपालन विभाग इस बीमारी को लेकर लगातार सतर्क रहने की सलाह दे रहा है.
गांव-गांव पहुंच रही टीकाकरण टीम
पशुओं को इस बीमारी से बचाने के लिए मुफ्त टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है. विभाग की टीमें गांव-गांव जाकर पशुओं को सुरक्षा का टीका लगा रही हैं. चार महीने से अधिक उम्र के सभी गाय और भैंसों को यह टीका लगाया जा रहा है. टीकाकरण के बाद पशु के कान में पीले रंग का एक छल्ला लगाया जाता है. यह छल्ला इस बात का संकेत होता है कि पशु को टीका लग चुका है. पशुपालकों से कहा गया है कि इस पहचान चिन्ह को हटाएं नहीं, क्योंकि अगली बार टीकाकरण के समय यही पहचान काम आती है.
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हर छह महीने में जरूरी सुरक्षा डोज
विशेषज्ञों के अनुसार खुरपका-मुंहपका से बचाव का सबसे आसान और सुरक्षित तरीका टीकाकरण है. यह टीका हर साल छह महीने के अंतराल पर लगाया जाता है. इससे पशुओं की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बनी रहती है और बीमारी फैलने का खतरा कम हो जाता है. अगर किसी गांव में एक पशु को यह बीमारी हो जाए तो दूसरे पशुओं में भी संक्रमण फैल सकता है. इसलिए पूरे गांव के पशुओं का एक साथ टीकाकरण करना जरूरी माना जाता है. इससे बीमारी को फैलने से पहले ही रोका जा सकता है.
बीमारी से बचाव ही सबसे बड़ा इलाज
पशु बीमार होने पर इलाज करवाना कई बार महंगा और मुश्किल हो जाता है. बीमारी के दौरान पशु का दूध कम हो जाता है, जिससे पशुपालकों की आमदनी पर सीधा असर पड़ता है. कुछ मामलों में पशुपालक आर्थिक नुकसान के कारण पशु को बेचने तक के लिए मजबूर हो जाते हैं. इसीलिए विभाग पशुपालकों से अपील कर रहा है कि वे अपने सभी पशुओं का समय पर टीकाकरण जरूर करवाएं. थोड़ी सी सावधानी और समय पर लगाया गया टीका पशुओं को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकता है. टीकाकरण से न सिर्फ पशु स्वस्थ रहते हैं, बल्कि दूध उत्पादन भी बना रहता है और पशुपालकों की रोज़ी-रोटी सुरक्षित रहती है. यही वजह है कि इस अभियान को पशुपालकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है.