बकरियों की आम बीमारियां बन सकती हैं बड़ा खतरा, समय पर करें इलाज.. साफ-सफाई भी बहुत जरूरी
बकरी पालन में कई खतरनाक और आम बीमारियां तेजी से फैल सकती हैं, जिससे किसानों को बड़ा नुकसान होता है. सही समय पर टीकाकरण, साफ-सफाई और शुरुआती लक्षण पहचानना बेहद जरूरी है. अगर किसान सतर्क रहें और तुरंत इलाज कराएं, तो बकरियों को बीमारियों से बचाकर अच्छा उत्पादन बनाए रखा जा सकता है.
Goat Farming: गांवों में बकरी पालन कम लागत में अच्छा मुनाफा देने वाला काम माना जाता है, लेकिन छोटी-सी लापरवाही बड़ा नुकसान कर सकती है. कई बार बकरियों में अचानक बीमारी फैलती है और किसान समझ ही नहीं पाते कि क्या करें. केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के डॉ. वाई के सोनी के अनुसार, अगर किसान समय पर बीमारी पहचान लें और सही कदम उठाएं, तो बकरियों को आसानी से बचाया जा सकता है.
ये हैं बकरियों की खतरनाक बीमारियां
डॉ. सोनी के मुताबिक, बकरियों में कुछ बीमारियां सबसे ज्यादा देखने को मिलती हैं, जिनसे सावधान रहना जरूरी है. इनमें पीपीआर, फड़किया, खुरपका-मुंहपका और गोट पॉक्स जैसी वायरल बीमारियां शामिल हैं. पीपीआर सबसे खतरनाक बीमारी मानी जाती है, जिसमें बकरी को तेज बुखार, मुंह में घाव और दस्त होने लगते हैं. वहीं फड़किया बीमारी में बकरी अचानक गिर जाती है और सांस लेने में परेशानी होती है. खुरपका-मुंहपका में मुंह और पैरों में छाले हो जाते हैं, जिससे बकरी ठीक से चल नहीं पाती. गोट पॉक्स में शरीर पर दाने और घाव बन जाते हैं. अगर समय पर ध्यान न दिया जाए तो ये बीमारियां तेजी से फैलती हैं और पूरे झुंड को प्रभावित कर सकती हैं.
साधारण बीमारियां भी बन सकती हैं बड़ी समस्या
केवल वायरल बीमारियां ही नहीं, बल्कि कुछ सामान्य समस्याएं भी बकरियों के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं. जैसे अफारा, जिसमें पेट में गैस भर जाती है और बकरी का पेट फूल जाता है. निमोनिया भी एक आम बीमारी है, खासकर सर्दियों में, जिसमें खांसी और सांस लेने में दिक्कत होती है. इसके अलावा आंतरिक और बाहरी परजीवी जैसे पेट के कीड़े, जुएं और चिचड़ी भी बकरियों को कमजोर बना देते हैं. इससे बकरी का वजन कम होता है और उत्पादन भी घटता है. इसलिए इन छोटी समस्याओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
बचाव के आसान तरीके, जो हर किसान अपनाएं
डॉ. सोनी के अनुसार, अगर कुछ आसान बातों का ध्यान रखा जाए तो बकरियों को बीमार होने से बचाया जा सकता है. सबसे जरूरी है समय पर टीकाकरण. पीपीआर, ईटी, एफएमडी और गोट पॉक्स के टीके सही समय पर जरूर लगवाएं. इसके अलावा बाड़े की सफाई भी बहुत जरूरी है. रोज सफाई करें और समय-समय पर चूने का छिड़काव करें, ताकि कीटाणु न पनपें. नए जानवरों को सीधे झुंड में शामिल न करें, उन्हें 15 से 30 दिन अलग रखें. इससे बीमारी फैलने का खतरा कम हो जाता है. इसके साथ ही बकरियों को साफ पानी और संतुलित चारा दें. अचानक चारा बदलने से भी समस्या हो सकती है, इसलिए धीरे-धीरे बदलाव करें.
बीमारी होने पर तुरंत उठाएं ये कदम
अगर किसी बकरी में बीमारी के लक्षण दिखें, तो उसे तुरंत बाकी झुंड से अलग कर दें. इससे बाकी जानवर सुरक्षित रहते हैं. इसके बाद बिना देरी किए पशु चिकित्सक से सलाह लें. खुद से दवा देने से कभी-कभी हालत और खराब हो सकती है. अफारा जैसी स्थिति में प्राथमिक उपचार के तौर पर मीठा सोडा या सरसों का तेल दिया जा सकता है, लेकिन यह स्थायी इलाज नहीं है. सही इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह जरूरी है. डॉ. सोनी के अनुसार, जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है. अगर किसान समय रहते सावधानी बरतें, तो नुकसान से बच सकते हैं.