Desi Poultry Farming: खुद चारा ढूंढने वाली देसी मुर्गियां, जो किसानों की कम खर्च में करा रहीं दोगुनी कमाई

गांवों में देसी मुर्गी पालन तेजी से बढ़ रहा है. सोनाली और FFG-2 नस्ल कम बीमार पड़ती हैं और खुद चारा ढूंढ लेती हैं. इससे दाना और दवा का खर्च घटता है. किसान अंडा, चूजा और मांस बेचकर अच्छी कमाई कर रहे हैं. कम जोखिम में ज्यादा मुनाफा मिल रहा है.

नोएडा | Published: 12 Feb, 2026 | 11:36 AM

Desi Poultry Farming: गांवों में अब खेती के साथ-साथ देसी मुर्गी पालन भी कमाई का मजबूत जरिया बनता जा रहा है. खासकर ऐसी नस्लें, जो खुद चारा ढूंढकर खा लेती हैं और कम बीमार पड़ती हैं, किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही हैं. कम खर्च, कम जोखिम और ज्यादा मुनाफा-यही वजह है कि अब कई किसान फार्म वाली मुर्गियों की जगह देसी नस्ल अपना रहे हैं.

फार्म की जगह देसी नस्ल की ओर बढ़ते कदम

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पहले कई किसान फार्म  में पाली जाने वाली सफेद नस्ल की मुर्गियां पालते थे. इन मुर्गियों में दाना, दवा और देखभाल पर काफी खर्च आता था. बीमारी का खतरा भी ज्यादा रहता था. कई बार अचानक बीमारी फैलने से बड़ा नुकसान हो जाता था. अब किसान देसी नस्ल की सोनाली और FFG-2 जैसी मुर्गियां पाल रहे हैं. इन मुर्गियों को खुले में पालना आसान है. ये ज्यादा मजबूत होती हैं और जल्दी बीमार नहीं पड़तीं. इसी वजह से किसानों का खर्च घटा है और मुनाफा बढ़ा है.

खुले में पालन, चारे का कम खर्च

देसी मुर्गियों  की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये खुद अपना चारा खोज लेती हैं. खेत या बाउंड्री वाले छोटे से खुले फॉर्म में इन्हें छोड़ दिया जाता है. वहां ये कीड़े-मकोड़े, घास और खेत में गिरा अनाज खाकर बड़ी हो जाती हैं. किसानों को सिर्फ थोड़ा-बहुत दाना देना पड़ता है. इससे दाने पर खर्च काफी कम हो जाता है. दवा का खर्च भी कम आता है, क्योंकि ये नस्लें कम बीमार होती हैं. खुले माहौल में रहने से इनकी सेहत भी अच्छी रहती है. कम खर्च और आसान देखभाल की वजह से यह तरीका छोटे और मध्यम किसानों के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहा है.

सोनाली और FFG-2 की खासियत

देसी नस्ल में सोनाली और FFG-2 को ज्यादा बेहतर माना जा रहा है. सोनाली मुर्गी  वजन में हल्की होती है, लेकिन अंडे ज्यादा देती है. इसके अंडे बाजार में अच्छे दाम पर बिकते हैं. खास बात यह है कि यह खुद चूजे भी तैयार कर लेती है, जिससे अलग से चूजा खरीदने की जरूरत कम पड़ती है. वहीं FFG-2 नस्ल तेजी से बढ़ती है. करीब तीन महीने में इसका वजन ढाई से तीन किलो तक पहुंच जाता है. इसका मांस स्वादिष्ट माना जाता है और बाजार में इसकी कीमत भी फार्म की मुर्गियों से ज्यादा मिलती है. इन दोनों नस्लों को मिलाकर पालन करने से अंडे और मांस-दोनों से कमाई होती है.

अंडा, चूजा और मांस से तगड़ी कमाई

देसी मुर्गी पालन में एक साथ कई तरह से आमदनी होती है. किसान अंडे बेचते हैं, चूजे बेचते हैं और बड़े हो चुके मुर्गे-मुर्गियां भी बाजार में अच्छे दाम पर बेच देते हैं. तीन महीने में तैयार होने वाली मुर्गियां फार्म की मुर्गियों से ज्यादा दाम पर बिकती हैं, क्योंकि लोग देसी मांस और देसी अंडे  को ज्यादा पसंद करते हैं. स्वाद अच्छा होने के कारण मांग भी बनी रहती है.

कम खर्च, कम बीमारी और ज्यादा बाजार भाव-इन तीन वजहों से देसी मुर्गी पालन अब गांवों में तेजी से बढ़ रहा है. जो किसान पहले नुकसान से परेशान थे, अब वही इस नए तरीके से बेहतर कमाई कर रहे हैं. अगर थोड़ी सी जगह और सही देखभाल हो, तो देसी मुर्गी पालन खेती  के साथ एक मजबूत अतिरिक्त आय का जरिया बन सकता है. यही कारण है कि अब गांवों में यह मॉडल तेजी से लोकप्रिय हो रहा है.

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