Goat Farming: बकरियों की 4 घंटे में जान ले लेती है ये बीमारी, पशु विज्ञानी ने किसानों को किया अलर्ट, उपाय बताए

केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. वाई के सोनी ने किसान इंडिया से बातचीत में कहा कि सही नस्ल चुनकर बकरी पालन से अच्छी कमाई की जा सकती है. उन्होंने मांस और दूध के लिए अलग-अलग नस्लों की जानकारी दी और किसानों को बकरियों में होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण की सलाह भी दी.

Saurabh Sharma
नोएडा | Updated On: 6 Mar, 2026 | 02:47 PM

Goat Farming: ग्रामीण इलाकों में बकरी पालन आज भी किसानों और पशुपालकों के लिए कम लागत में अच्छी कमाई का साधन माना जाता है. लेकिन अगर सही नस्ल और सही देखभाल का तरीका पता हो तो यह काम और ज्यादा फायदे का हो सकता है. किसान इंडिया से बातचीत के दौरान केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. वाई.के. सोनी ने बताया कि किसान अगर अपनी जरूरत के हिसाब से सही नस्ल चुनें और समय पर टीकाकरण करें, तो बकरी पालन से दूध और मांस दोनों में अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.

डॉ. सोनी ने बकरियों में होने वाली खतरनाक बीमारियों को लेकर भी चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि कई बीमारी बेहद घातक होती है. कई मामलों में 4 से 24 घंटे के अंदर बकरी की मौत तक हो सकती है, इसलिए पशुपालकों को समय पर टीकाकरण और सही देखभाल पर खास ध्यान देना बेहद जरूरी है.

मांस उत्पादन के लिए इन नस्लों का करें पालन

डॉ. वाई.के. सोनी ने बताया कि ज्यादातर किसान बकरी पालन दो मुख्य कारणों से करते हैं-दूध उत्पादन और मांस उत्पादन. मांस के लिए किसान खास तौर पर बरबरी नस्ल की बकरी का पालन ज्यादा करते हैं. यह नस्ल उत्तर प्रदेश के एटा, अलीगढ़, हाथरस और मथुरा जैसे जिलों में काफी पाई जाती है. बरबरी बकरी का शरीर आकार में छोटा होता है, लेकिन इसकी खासियत यह है कि यह तेजी से बढ़ती है और अच्छी संख्या में बच्चे देती है. बरबरी बकरी की पहली बार बच्चे देने की उम्र लगभग 13 से 16 महीने होती है. 12 महीने की उम्र में नर बकरी का वजन करीब 20 से 30 किलोग्राम और मादा का वजन 18 से 25 किलोग्राम तक होता है. यही कारण है कि मांस उत्पादन के लिए यह नस्ल काफी लोकप्रिय मानी जाती है.

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केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. वाई.के. सोनी.

बरबरी बकरी की खासियत

बरबरी बकरी की सबसे बड़ी खासियत इसकी बहु-प्रसव क्षमता है. डॉ. सोनी के अनुसार यह नस्ल लगभग 60 से 70 प्रतिशत मामलों में एक बार में दो से तीन बच्चों को जन्म देती है. इसके अलावा यह बकरी सीमित संसाधनों में भी आसानी से पाली जा सकती है. यही वजह है कि छोटे और मध्यम किसान  इसे ज्यादा पसंद करते हैं. दूध उत्पादन की बात करें तो बरबरी बकरी लगभग 90 दिनों में 70 से 100 लीटर तक दूध दे सकती है. इसके साथ ही मांस उत्पादन भी अच्छा माना जाता है, इसलिए इसे दोहरे फायदे वाली नस्ल भी कहा जाता है.

ब्लैक बंगाल बकरी भी मांस के लिए अच्छी नस्ल

मांस उत्पादन के लिए एक और लोकप्रिय नस्ल ब्लैक बंगाल बकरी  है. यह नस्ल मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल के दक्षिणी हिस्सों में पाई जाती है. ब्लैक बंगाल बकरी का आकार छोटा होता है लेकिन इसका मांस बहुत स्वादिष्ट और बाजार में ज्यादा मांग वाला माना जाता है. यही वजह है कि कई किसान इस नस्ल का पालन भी मांस उत्पादन के लिए करते हैं. डॉ. सोनी का कहना है कि किसान अगर अपने क्षेत्र की जलवायु और उपलब्ध चारे के अनुसार नस्ल चुनते हैं तो बकरी पालन ज्यादा सफल हो सकता है.

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विशेषज्ञ ने किसानों को बकरी नस्ल और बीमारी बचाव बताया.

दूध के लिए जखराना, सिरोही और जमुनापारी बेहतर

अगर किसान दूध उत्पादन के लिए बकरी पालन  करना चाहते हैं तो उन्हें जखराना, सिरोही और जमुनापारी नस्ल की बकरियों का पालन करना चाहिए. डॉ. सोनी बताते हैं कि ये नस्लें दूध और मांस दोनों के लिए अच्छी मानी जाती हैं. खासकर जमुनापारी नस्ल को दूध देने वाली प्रमुख नस्लों में गिना जाता है. उनका कहना है कि पशुपालकों को कोशिश करनी चाहिए कि वे अपने इलाके में पाई जाने वाली प्रमुख नस्लों का ही पालन करें. इससे बकरियां स्थानीय मौसम और वातावरण में जल्दी ढल जाती हैं और उनका उत्पादन भी अच्छा रहता है.

बकरियों में होने वाली खतरनाक बीमारियों से रहें सावधान

बकरी पालन में सबसे बड़ा खतरा बीमारियों  का होता है. डॉ. वाई.के. सोनी ने बताया कि एंटेरोटॉक्सिमिया नाम की बीमारी बकरियों के लिए बहुत खतरनाक होती है. इसे आम भाषा में आंतों का जहर भी कहा जाता है. इस बीमारी में बकरी की मौत बहुत जल्दी हो सकती है. कई मामलों में 4 से 24 घंटे के अंदर ही पशु की जान चली जाती है. इसलिए समय पर टीकाकरण और देखभाल बेहद जरूरी है. इसके अलावा बकरी चेचक (Goat Pox) भी एक आम बीमारी है, जिसमें बकरी के शरीर और खुरों पर दाने या घाव दिखाई देने लगते हैं. वहीं खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियां भी बकरियों को प्रभावित कर सकती हैं. डॉ. सोनी का कहना है कि अगर किसान इन बीमारियों की जानकारी रखें और समय-समय पर टीकाकरण  कराते रहें, तो नुकसान से काफी हद तक बचा जा सकता है.

कृत्रिम गर्भाधान से सुधर सकती है नस्ल

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बकरी पालन.

बकरी पालन में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल भी काफी फायदेमंद हो सकता है. डॉ. सोनी के अनुसार कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से उच्च गुणवत्ता वाले बकरों  का उपयोग किया जा सकता है. इस तकनीक के जरिए एक अच्छे बकरे से कई बकरियों का गर्भाधान कराया जा सकता है. इससे बेहतर नस्ल के मेमनों का जन्म होता है और धीरे-धीरे पूरे झुंड की गुणवत्ता सुधर जाती है. उनका कहना है कि अगर किसान सही नस्ल का चयन करें, समय पर टीकाकरण कराएं और नई तकनीकों को अपनाएं, तो बकरी पालन कम लागत में अच्छी आय का मजबूत जरिया बन सकता है.

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Published: 6 Mar, 2026 | 02:43 PM

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