झारखंड के ग्रामीण इलाकों में खेती और पशुपालन सदियों से ग्रामीण आजीविका का मजबूत आधार रहे हैं. खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए पशुपालन अतिरिक्त आय और रोजगार का एक अहम जरिया है. झारखंड की अनुकूल जलवायु और समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों ने बकरी पालन को भी काफी लाभकारी बनाया है. आज के दौर में जहां खेती पर कई चुनौतियां हैं, वहीं बकरी पालन किसानों के लिए एक सुरक्षित और लाभदायक विकल्प के रूप में उभर रहा है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, सही नस्लों का चयन और अच्छी देखभाल से किसान बकरी पालन से बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं. झारखंड के लिए कुछ ऐसी बकरी की नस्लें हैं, जो यहां के मौसम और साधारण चारे में भी आसानी से पनप जाती हैं और किसानों की आमदनी में इजाफा कर सकती हैं. आइए जानते हैं उन पांच प्रमुख नस्लों के बारे में, जो झारखंड में बकरीपालन को एक सफल व्यवसाय बना सकती हैं.
ब्लैक बंगाल नस्ल:- मजबूत और बहुउपयोगी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ब्लैक बंगाल बकरी झारखंड के किसानों के बीच सबसे लोकप्रिय है. यह नस्ल छोटी कद की होने के बावजूद बेहद मजबूत होती है. इसकी खासियत यह है कि यह जल्दी बच्चे देती है और दूध उत्पादन में भी सक्षम होती है. ब्लैक बंगाल बकरी का मांस और खाल बाजार में उच्च मूल्य पर बिकता है, जिससे किसानों को अच्छा लाभ मिलता है. इसके अलावा यह नस्ल बारिश के मौसम और गर्मी दोनों में आसानी से जीवित रह सकती है.
जमनापरी नस्ल:- दूध और मांस की अच्छी गुणवत्ता
जमनापरी बकरी बड़ी और शारीरिक रूप से मजबूत होती है. यह नस्ल अपने उच्च दूध उत्पादन के लिए जानी जाती है, जो ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बेहद फायदेमंद है. जमनापरी बकरी के मांस की गुणवत्ता भी अच्छी होती है, जो बाजार में अच्छा मूल्य प्राप्त करता है. हालांकि इस नस्ल को अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है, लेकिन निवेश के बदले किसान को अच्छा मुनाफा मिलता है.
बरबरी नस्ल:- सूखे और गर्म मौसम की मजबूत
बरबरी नस्ल की बकरियां मध्यम आकार की होती हैं और दूध एवं मांस दोनों के लिए उपयोगी हैं. झारखंड जैसे क्षेत्रों में जहां गर्म और सूखा मौसम सामान्य है, बरबरी बकरियां वहां अच्छी तरह से पनप जाती हैं. किसान इस नस्ल की ओर आकर्षित हो रहे हैं क्योंकि यह कम चारे में भी टिकाऊ होती है और रोगों से लड़ने की क्षमता में भी बेहतर होती है.
सिरोही नस्ल:- रोग प्रतिरोधक और मजबूत शरीर
राजस्थान की सिरोही नस्ल धीरे-धीरे झारखंड में भी लोकप्रिय हो रही है. इसकी खासियत इसका मजबूत शरीर और अधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता है. यह बकरी कठिन मौसम और साधारण चारे में भी जीवित रह सकती है, जिससे किसान इसे बेहतर विकल्प मानते हैं. सिरोही बकरी का मांस और दूध दोनों ही अच्छी गुणवत्ता के होते हैं, जो बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं.
स्थानीय और मिश्रित नस्लें:- कम खर्च और टिकाऊ
झारखंड के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में स्थानीय और मिश्रित नस्लों की बकरियां भी काफी प्रचलित हैं. ये नस्लें साधारण जंगल चारे पर भी आसानी से जीवित रह जाती हैं और बीमारियों के प्रति अधिक प्रतिरोधक होती हैं. इन पर कम खर्च आता है और ये किसानों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ से बचाती हैं. स्थानीय बकरियां सामाजिक और आर्थिक रूप से भी ग्रामीण समुदायों के लिए महत्वपूर्ण हैं.
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