Sahiwal cattle breeding: भारत के किसानों और पशुपालकों के लिए एक बहुत ही अच्छी और राहत भरी खबर सामने आई है. अब देसी गायों की नस्ल को बेहतर बनाने और दूध उत्पादन बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है. बरेली के इज्जतनगर स्थित आईसीएआर–इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICAR-IVRI) के वैज्ञानिकों ने साहीवाल नस्ल की गायों के प्रजनन में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है.
इस सफलता की खास बात यह है कि इसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे कम समय में बेहतर नस्ल के बछड़े तैयार करना संभव हो गया है. इससे आने वाले समय में किसानों की आय बढ़ाने और डेयरी सेक्टर को मजबूत करने में बड़ी मदद मिल सकती है.
आधुनिक तकनीक से आसान हुआ नस्ल सुधार
इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार, इस उपलब्धि के पीछे ओवम पिक-अप (OPU), इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) और एम्ब्रियो ट्रांसफर (ET) जैसी आधुनिक तकनीकों का बड़ा योगदान है. पहले जहां अच्छी नस्ल तैयार करने में कई साल लग जाते थे, अब वही काम कम समय में संभव हो रहा है.
वैज्ञानिक लैब में ही बेहतर गुणों वाले भ्रूण तैयार करते हैं और फिर उन्हें गायों में प्रत्यारोपित करते हैं. इससे एक ही समय में कई बेहतर नस्ल के बछड़े तैयार किए जा सकते हैं. यह तकनीक पशुपालन के क्षेत्र में एक नई क्रांति की तरह मानी जा रही है.
5 दिनों में 5 स्वस्थ बछड़े, बड़ी सफलता
वैज्ञानिकों की मेहनत का परिणाम 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए एक विशेष प्रयोग में देखने को मिला. सिर्फ पांच दिनों के भीतर पांच स्वस्थ साहीवाल बछड़ों का जन्म हुआ. ये बछड़े सिर्फ संख्या में नहीं, बल्कि गुणवत्ता के लिहाज से भी बहुत खास हैं. इनका जन्म उच्च गुणवत्ता वाले जर्मप्लाज्म से हुआ है, जिससे उम्मीद की जा रही है कि ये आगे चलकर ज्यादा दूध देने वाली नस्ल बनेंगे.
बेहतर जीन से बढ़ेगा उत्पादन
इस प्रयोग में जिस साहीवाल गाय को चुना गया, वह रोजाना 12 लीटर से ज्यादा दूध देती है. वहीं जिस सांड के वीर्य का उपयोग किया गया, उसकी मातृ लाइन लगभग 3,320 किलोग्राम दूध उत्पादन वाली रही है. इस तरह दोनों के अच्छे गुणों को मिलाकर ऐसे बछड़े तैयार किए गए हैं, जिनमें भविष्य में ज्यादा उत्पादन की क्षमता होगी. इसका सीधा फायदा किसानों को मिलेगा, क्योंकि ज्यादा दूध का मतलब ज्यादा आमदनी है.
लंबे रिसर्च का नतीजा है यह सफलता
इस पूरी योजना की शुरुआत 2022-23 में की गई थी. वैज्ञानिकों ने लगातार मेहनत और प्रयोगों के जरिए इस तकनीक को सफल बनाया. इस टीम का नेतृत्व डॉ. बृजेश कुमार ने किया, जबकि डॉ. एस. के. सिंह (संयुक्त निदेशक, अनुसंधान) ने पूरे प्रोजेक्ट का मार्गदर्शन किया.
ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने इस उपलब्धि को पशुपालन क्षेत्र के लिए मील का पत्थर बताया है. उनके अनुसार, यह सफलता दिखाती है कि विज्ञान और तकनीक के जरिए भारत अपने पशुधन क्षेत्र को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर की तकनीक के बराबर
इस रिसर्च में जो परिणाम सामने आए हैं, वे वैश्विक स्तर के बराबर हैं. वैज्ञानिकों ने अलग-अलग नस्लों में अंडाणु प्राप्त करने और भ्रूण विकसित करने की प्रक्रिया को काफी बेहतर किया है. रिपोर्ट के अनुसार, थारपारकर नस्ल में औसतन 14.5, साहीवाल में 13.14 और मुर्रा भैंस में 4.5 से 5.5 तक ओसाइट प्राप्त किए गए. वहीं भ्रूण विकास दर 47 प्रतिशत से अधिक रही, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के करीब है.
किसानों के लिए कैसे फायदेमंद
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा किसानों को मिलेगा. अब वे कम समय में बेहतर नस्ल के पशु तैयार कर सकेंगे. इससे दूध उत्पादन बढ़ेगा और उनकी आय में भी सुधार होगा.
साथ ही, यह तकनीक देशी नस्लों को बचाने और उन्हें मजबूत बनाने में भी मदद करेगी, जिससे हमारी पारंपरिक पशुधन संपदा सुरक्षित रह सकेगी.
भविष्य में बड़े बदलाव की उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू किया गया, तो आने वाले समय में भारत का डेयरी सेक्टर और मजबूत होगा. इससे न सिर्फ उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि देश आत्मनिर्भर भी बनेगा.