Dairy Farming : आज का किसान सिर्फ फसल पर निर्भर नहीं रहना चाहता. बढ़ती लागत और अनिश्चित आमदनी के बीच अब पशुपालन, खासकर देसी गायों का पालन, किसानों के लिए कमाई का भरोसेमंद जरिया बनता जा रहा है. जैविक खेती, शुद्ध दूध और देसी नस्लों के संरक्षण पर जोर बढ़ने के साथ ही देसी गायों की मांग तेजी से बढ़ी है. ऐसे में थारपारकर, गिर और देओनी जैसी गायें किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती हैं.
क्यों बढ़ रही है देसी गायों की मांग
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में अब लोग शुद्ध और प्राकृतिक दूध की तरफ लौट रहे हैं. A2 दूध, जैविक खेती और प्राकृतिक जीवनशैली के चलते देसी गायों का महत्व पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है. देसी नस्लें कम खर्च में पल जाती हैं, बीमार कम पड़ती हैं और स्थानीय मौसम के अनुसार खुद को आसानी से ढाल लेती हैं. यही वजह है कि छोटे और सीमांत किसान भी अब देसी गायों को अपनाने लगे हैं, जिससे उनकी आमदनी के नए रास्ते खुल रहे हैं.
थारपारकर गाय: गर्मी में भी शानदार उत्पादन
थारपारकर गाय का मूल स्थान राजस्थान का थार मरुस्थल क्षेत्र माना जाता है. यह नस्ल तेज गर्मी, कम पानी और कठिन परिस्थितियों में भी आसानी से जीवित रह सकती है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता है, जिससे इलाज पर खर्च कम आता है. अगर सही देखभाल की जाए, तो थारपारकर गाय रोजाना करीब 15 से 18 लीटर तक दूध दे सकती है. यही कारण है कि राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में किसान तेजी से इस नस्ल को अपना रहे हैं.
गिर गाय: A2 दूध की वजह से सबसे ज्यादा लोकप्रिय
गिर गाय देश की सबसे प्रसिद्ध देसी नस्लों में गिनी जाती है. इसका मूल स्थान गुजरात का गिर क्षेत्र है. यह गाय अपने A2 श्रेणी के दूध के लिए जानी जाती है, जिसकी बाजार में काफी मांग है. गिर गाय आमतौर पर रोजाना 6 से 10 लीटर दूध देती है. इसका दूध स्वादिष्ट और पोषक माना जाता है. साथ ही यह नस्ल शांत स्वभाव की होती है, जिससे इसका पालन करना भी आसान होता है. सही खान-पान और देखभाल से गिर गाय किसानों को अच्छी आमदनी दिला सकती है.
देओनी गाय: दूध के साथ खेती में भी मददगार
देओनी गाय एक ऐसी देसी नस्ल है, जो दूध उत्पादन के साथ-साथ खेती के कामों में भी उपयोगी मानी जाती है. इसका विकास महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना के सीमावर्ती इलाकों में हुआ है. यह गाय मजबूत शरीर और अच्छी सहनशक्ति के लिए जानी जाती है. देओनी गाय रोजाना 4 से 8 लीटर दूध देती है और सालभर में करीब 1500 लीटर दूध उत्पादन कर सकती है. खेती और पशुपालन दोनों करने वाले किसानों के लिए यह नस्ल दोहरा फायदा देती है.
किसानों के लिए क्यों है ये नस्लें फायदेमंद
थारपारकर, गिर और देओनी जैसी देसी गायें कम खर्च में पलती हैं, बीमार कम होती हैं और लंबे समय तक दूध देती हैं. इनके गोबर और गोमूत्र का इस्तेमाल जैविक खेती में भी किया जा सकता है, जिससे खेती की लागत और कम हो जाती है. अगर किसान सही नस्ल चुनकर देसी गायों का पालन करें, तो यह उनके लिए स्थायी और सुरक्षित आमदनी का मजबूत जरिया बन सकता है.