जिस घास को लोग समझते थे बेकार.. वही बढ़ा रही दूध, पशुओं के लिए बनी वरदान
पहाड़ों में मिलने वाली एक देसी हरी घास जिसका नाम बिच्छू घास है. इसे सही तरीके से तैयार करने पर पशुओं के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रही है. ये चारा पाचन सुधारता है, सेहत मजबूत करता है और दूध की मात्रा व गुणवत्ता दोनों बढ़ाने में मदद करता है. खास बात यह है कि यह पूरी तरह प्राकृतिक और बिना केमिकल का विकल्प है.
Milk Production : बिच्छू घास को कच्ची हालत में कभी भी पशुओं को नहीं खिलाया जाता. इसकी असली ताकत तब सामने आती है, जब इसे पानी में उबालकर या अच्छे से पकाकर दिया जाए. पकने के बाद इसकी जलन खत्म हो जाती है और यह पूरी तरह सुरक्षित पशु आहार बन जाती है. पुराने समय से यह तरीका अपनाया जा रहा है, जब बाजार का रेडीमेड चारा उपलब्ध नहीं होता था. यही वजह है कि यह घास आज भी देसी ज्ञान की मिसाल मानी जाती है.
पाचन सुधरे तो दूध अपने आप बढ़े
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बिच्छू घास और नेपियर घास की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह गाय के पाचन तंत्र को मजबूत करती है. जब गाय का पेट ठीक रहता है, तो वह चारा अच्छे से खाती है और उसे पूरी तरह पचा पाती है. पाचन सुधरने का सीधा असर दूध पर पड़ता है. गाय ज्यादा एक्टिव रहती है, थकान कम होती है और शरीर में अंदर से ताकत आती है. यही वजह है कि दूध की मात्रा के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता भी बेहतर हो जाती है.
दूध की क्वालिटी में भी दिखता है फर्क
इस देसी घास को नियमित रूप से खिलाने पर दूध गाढ़ा और स्वाद में बेहतर माना जाता है. गाय की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है, जिससे वह जल्दी बीमार नहीं पड़ती. बदलते मौसम में जब पशु अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं, तब यह घास उनकी सेहत को संभालने में मदद करती है. कम खर्च में इतना असर मिलना इसे बाकी चारे से अलग बनाता है.
बिना केमिकल, पूरी तरह प्राकृतिक आहार
आज के समय में बाजार के कई पशु आहार महंगे होने के साथ-साथ केमिकल युक्त भी होते हैं. इसके मुकाबले यह देसी घास पूरी तरह प्राकृतिक है. न कोई दवा, न कोई मिलावट. इसे सही तरीके से पकाकर खिलाया जाए, तो यह पूरी तरह सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प बन जाती है. यही वजह है कि इसे प्रकृति की तरफ लौटने वाला चारा कहा जा सकता है.
सस्ता, असरदार और भरोसेमंद विकल्प
यह घास उन पशुपालकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं, जो कम खर्च में बेहतर नतीजे चाहते हैं. न बीज का खर्च, न बाजार की दौड़. बस सही पहचान और सही तरीका जरूरी है. अगर इसे समझदारी से इस्तेमाल किया जाए, तो यह गायों की सेहत और दूध उत्पादन दोनों में लगातार फायदा देती है. देसी ज्ञान और प्रकृति की ताकत मिल जाए, तो महंगे चारे की जरूरत खुद-ब-खुद खत्म हो जाती है.