दूध उत्पादन बढ़ाने का नया फॉर्मूला! 10 साल तक हरा चारा देने वाली घास बना रही किसानों को अमीर

नेपियर या हाथी घास डेयरी किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है. यह एक बार लगाने के बाद 10 साल तक हरा चारा देती है. इससे दूध उत्पादन बढ़ रहा है और किसानों की आमदनी में लगातार इजाफा हो रहा है.

नोएडा | Published: 1 Nov, 2025 | 10:59 AM

Green Fodder : मौसम चाहे जैसा भी हो, अगर पशुओं को हरा और पौष्टिक चारा लगातार मिले, तो दूध की धार कभी कम नहीं होती. यही करिश्मा कर रही है नेपियर घास या हाथी घास. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घास डेयरी क्षेत्र में नई क्रांति का कारण बनी है. यह न केवल तेजी से बढ़ती है, बल्कि एक बार लगाने के बाद पूरे 10 साल तक हरा चारा देती है, जिससे किसानों के खर्च घटे और आमदनी कई गुना बढ़ गई है.

एक पौधा, जो 10 साल तक देता है हरा चारा

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नेपियर या हाथी घास  एक खास फसल है जो एक बार लगाने के बाद कई सालों तक लगातार कटिंग देती रहती है. यह घास सामान्यत: 12 से 16 फीट तक ऊंची हो सकती है और हर 45-60 दिन में नई कटिंग के लिए तैयार हो जाती है. इससे किसानों को बार-बार बीज, जुताई या श्रम पर खर्च  नहीं करना पड़ता. इस वजह से यह डेयरी सेक्टर में एक लॉन्ग-टर्म ग्रीन इनकम का जरिया बन रही है.

दूध उत्पादन में 20% तक बढ़ोतरी, पशु भी खुश

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जिन डेयरी किसानों ने हाथी घास को अपनाया है, उनके पशुओं के दूध उत्पादन  में 15 से 20 फीसदी तक की वृद्धि दर्ज की गई है. इस घास का स्वाद हल्का मीठा होता है, जिससे पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं. इसमें भरपूर प्रोटीन, फाइबर और मिनरल्स होते हैं जो पशुओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं. इससे न केवल दूध की मात्रा बढ़ती है बल्कि उसकी गुणवत्ता भी सुधरती है.

कम पानी में भी हरी-भरी- सूखे इलाकों के लिए वरदान

नेपियर घास की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे कम सिंचाई  और कम देखभाल में भी आसानी से उगाया जा सकता है. यह सूखे या अर्ध-शुष्क इलाकों में भी तेजी से बढ़ती है. इसकी गहरी जड़ें मिट्टी को मजबूती देती हैं, जिससे मिट्टी का कटाव रुकता है और खेत की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है. वैज्ञानिकों के अनुसार, यह घास क्लाइमेट-रेजिस्टेंट फसल के रूप में भविष्य की खेती के लिए बेहद उपयोगी है.

लागत में भारी कमी, किसानों की आमदनी दोगुनी

पारंपरिक चारे की तुलना में नेपियर घास  को उगाने में बहुत कम खर्च आता है. यह फसल जैविक खाद और सामान्य पानी से भी तेजी से बढ़ती है. किसानों का कहना है कि इससे चारे पर आने वाला खर्च लगभग 40 फीसदी तक कम हो गया है. हर कटिंग से पर्याप्त मात्रा में हरा चारा मिलने के कारण डेयरी फार्मिंग की लागत घट गई है और किसानों की कुल आमदनी में बड़ी बढ़ोतरी हुई है.

डेयरी सेक्टर में ‘ग्रीन रेवोल्यूशन’ की नई शुरुआत

अब कई किसान इस घास को डेयरी सेक्टर का हरा सोना कह रहे हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर इसे ड्रिप सिंचाई, ऑर्गेनिक खाद और नियमित कटिंग के साथ अपनाया जाए, तो यह सालभर लगातार हरा चारा दे सकती है. इससे डेयरी उत्पादन, रोजगार और पर्यावरण-तीनों में सुधार देखने को मिलेगा. आने वाले समय में यह फसल भारत के दुग्ध उत्पादन में अहम भूमिका निभा सकती है.

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