सेब बागानों के पेस्टिसाइड से मर रहीं ट्राउट मछलियां, कश्मीर के किसानों को लाखों का नुकसान

कश्मीर में कई मछली तालाब प्राकृतिक झरनों और नालों से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं. जब इन जल स्रोतों में रसायन पहुंचते हैं तो वही दूषित पानी तालाबों में भी आ जाता है. इसके कारण मछलियों के लिए अनुकूल वातावरण खत्म हो जाता है और कई बार बड़ी संख्या में मछलियों की मौत हो जाती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 14 Mar, 2026 | 09:43 AM

Kashmir trout farming crisis: कश्मीर घाटी में पिछले कुछ वर्षों में ट्राउट मछली पालन तेजी से बढ़ा है और यह क्षेत्र स्थानीय किसानों के लिए आय का एक अहम जरिया बनता जा रहा है. लेकिन अब इस बढ़ते हुए उद्योग के सामने एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है. सेब के बागों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जा रहे कीटनाशक और फफूंदनाशक अब मछलियों के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं. इन रसायनों के कारण कई इलाकों में मछलियों की अचानक मौत की घटनाएं सामने आ रही हैं, जिससे मछली पालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.

शोपियां के जावूरा गांव में सामने आ रही गंभीर समस्या

बिजनेसलाइन की खबर के अनुसार, दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के जावूरा गांव में रहने वाले ट्राउट मछली पालक शाकिर नजीर इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित किसानों में से एक हैं. शाकिर बताते हैं कि उनके मछली तालाबों में कई बार अचानक सैकड़ों मछलियां मृत अवस्था में तैरती हुई दिखाई देती हैं. यह घटना अब एक बार की नहीं रही, बल्कि बार-बार हो रही है, जिससे उनका व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हुआ है.

शाकिर नजीर बिजनेसलाइन को बताते हैं कि, आसपास के सेब के बागों में बड़ी मात्रा में कीटनाशक और फफूंदनाशक का छिड़काव किया जाता है. बारिश या सिंचाई के पानी के साथ ये रसायन बहकर तालाबों तक पहुंच जाते हैं. इससे पानी जहरीला हो जाता है और मछलियों के साथ-साथ मछलियों के बीज भी नष्ट हो जाते हैं. शाकिर का कहना है कि इस वजह से उन्हें अब तक करीब 20 लाख से 22 लाख रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ा है.

सेब के बागों में भारी मात्रा में रसायनों का इस्तेमाल

कश्मीर सेब उत्पादन के लिए पूरे देश में जाना जाता है और घाटी में हजारों हेक्टेयर क्षेत्र में सेब के बाग हैं. इन बागों को कीट और बीमारियों से बचाने के लिए बड़ी मात्रा में रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार मार्च से नवंबर के बीच सेब के बागों में लगभग 7,750 टन पेस्टिसाइड और 3,186 टन कीटनाशक का उपयोग किया जाता है.

मछली पालकों का कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में इस्तेमाल होने वाले ये रसायन आसपास के पर्यावरण और जल स्रोतों को प्रभावित कर रहे हैं. बागों से बहकर आने वाला पानी और कई जगहों पर बचा हुआ रसायन सीधे नालों और झरनों में डाल दिया जाता है, जिससे पानी दूषित हो जाता है.

जल स्रोतों के प्रदूषण से मर रही हैं मछलियां

कश्मीर में कई मछली तालाब प्राकृतिक झरनों और नालों से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं. जब इन जल स्रोतों में रसायन पहुंचते हैं तो वही दूषित पानी तालाबों में भी आ जाता है. इसके कारण मछलियों के लिए अनुकूल वातावरण खत्म हो जाता है और कई बार बड़ी संख्या में मछलियों की मौत हो जाती है.

मत्स्य विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, साल 2025 के पहले छह महीनों में दक्षिण कश्मीर में मछलियों की मौत के कम से कम नौ मामलों की पुष्टि हुई है. अधिकारियों के अनुसार जल स्रोतों में पेस्टिसाइड का मिलना इन घटनाओं का मुख्य कारण माना जा रहा है.

तेजी से बढ़ रहा था ट्राउट मछली पालन

कश्मीर में ट्राउट मछली पालन पिछले दशक में काफी तेजी से बढ़ा है. वर्ष 2015-16 में जहां ट्राउट उत्पादन सिर्फ 298 टन था, वहीं यह बढ़कर 2024-25 में 2,650 टन तक पहुंच गया है. इसके साथ ही इस क्षेत्र से होने वाली आय भी लगातार बढ़ी है. पहले इस उद्योग का राजस्व करीब 2.76 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 4.75 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.

यानी यह क्षेत्र किसानों और युवाओं के लिए तेजी से उभरता हुआ रोजगार का साधन बन रहा था. लेकिन अब पेस्टिसाइड प्रदूषण इस विकास की रफ्तार को प्रभावित कर सकता है.

किसानों ने प्रशासन से की सख्त कार्रवाई की मांग

अनंतनाग के एक मछली पालक का कहना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो घाटी में ट्राउट मछली पालन का भविष्य खतरे में पड़ सकता है. किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि सेब के बागों में इस्तेमाल होने वाले रसायनों के निस्तारण को नियंत्रित किया जाए और उन जल स्रोतों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए जिनसे मछली तालाबों को पानी मिलता है.

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