Animal Husbandry: हरियाणा के करनाल स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (ICAR-NDRI) के वैज्ञानिकों ने पशुओं की नस्ल सुधार के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है. राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के 100 गांवों में कृत्रिम गर्भाधान और उच्च गुणवत्ता वाले सांडों के सीमन का उपयोग कर बेहतर नस्ल के बछड़े तैयार किए गए हैं. इससे पशुपालकों को अधिक दूध देने वाले और बेहतर गुणवत्ता वाले पशु मिल सकेंगे.
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तकनीक पशुपालकों के लिए काफी लाभकारी साबित हो सकती है. इससे पशुओं की नस्ल में सुधार होगा, दूध उत्पादन बढ़ेगा और पशुपालकों की आय में भी वृद्धि होने की संभावना है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस मॉडल को अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है, जिससे देश में डेयरी क्षेत्र को और मजबूती मिलेगी. वैज्ञानिकों ने कहा कि इस परियोजना के तहत पैदा हुए पशुओं में सामान्य पशुओं की तुलना में तेजी से बढ़ने और कम उम्र में परिपक्व होने की क्षमता देखी गई है. उनका कहना है कि इससे किसानों को कम लागत में बेहतर नस्ल के पशु मिल सकेंगे और दूध उत्पादन बढ़ने से डेयरी व्यवसाय अधिक लाभदायक बनेगा.
16,200 पशु गर्भवती हो गए हैं
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह मॉडल देशभर के पशुपालकों की आय बढ़ाने में मील का पत्थर साबित हो सकता है. मुजफ्फरनगर जिले में चलाए गए इस विशेष प्रोजेक्ट के तहत 39,803 गायों और भैंसों का कृत्रिम गर्भाधान किया गया. इनमें से 16,200 पशु गर्भवती हुए और अधिकांश ने स्वस्थ बछड़ों को जन्म भी दे दिया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे पशुधन की गुणवत्ता और उत्पादकता दोनों में सुधार होगा.
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100 गांवों में जाकर डेयरी पशुओं तक योजना का लाभ पहुंचाया
आईसीएआर-एनडीआरआई के वैज्ञानिकों के अनुसार, मुजफ्फरनगर क्षेत्र के पशुपालकों के पास अच्छी नस्ल के पशु और गुणवत्तापूर्ण जर्मप्लाज्म की कमी थी, जिससे पशुओं की उत्पादकता औसत स्तर की थी. इसे देखते हुए वर्ष 2022 में राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत इस परियोजना की शुरुआत की गई थी, जिसे अब सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है. यह परियोजना मुजफ्फरनगर के लालूखेड़ी गांव स्थित एनडीआरआई के किसान सेवा केंद्र के माध्यम से संचालित की गई. केंद्र के निदेशक डॉ. धीर सिंह ने कहा कि 25 प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं ने 100 गांवों में जाकर डेयरी पशुओं तक इस योजना का लाभ पहुंचाया. इस परियोजना पर करीब 3.75 करोड़ रुपये खर्च किए गए.
पशुपालकों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी
उन्होंने कहा कि यह मॉडल दूसरे राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है. राज्य सरकारें इसे अपनाकर पशु नस्ल सुधार कार्यक्रमों को बढ़ावा दे सकती हैं. इससे दूध उत्पादन बढ़ेगा, डेयरी क्षेत्र मजबूत होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिलेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मॉडल को बड़े स्तर पर लागू किया जाए, तो इससे पशुपालकों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी और भारत को डेयरी उत्पादन के क्षेत्र में और अधिक मजबूत बनाया जा सकेगा.