सोयाबीन डीओसी की कमी से बढ़ी चिंता, महंगा चारा बना पोल्ट्री और पशुपालकों के लिए नई चुनौती

पशुपालन, पोल्ट्री और मछली पालन से जुड़े किसानों के लिए चारे की बढ़ती कीमतें नई चुनौती बनती जा रही हैं. प्रोटीन युक्त प्रमुख चारा सामग्री की कमी के कारण उत्पादन लागत बढ़ रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो किसानों की आय और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 13 Jun, 2026 | 04:27 PM

Soybean DOC: देश के पशुपालन, पोल्ट्री और जलीय कृषि क्षेत्र के सामने एक नई चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है. पशु आहार में प्रोटीन के प्रमुख स्रोत माने जाने वाले सोयाबीन डी-ऑयल्ड केक (डीओसी) की कमी ने चारा उद्योग की चिंता बढ़ा दी है.आपूर्ति घटने के कारण इसकी कीमतों में तेज उछाल आया है, जिसका सीधा असर पशुपालकों और किसानों की लागत पर पड़ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो इसका प्रभाव पूरे पशुधन क्षेत्र और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है.

40 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ीं कीमतें

पशु आहार उद्योग  से जुड़े संगठनों के अनुसार हाल के सप्ताहों में सोयाबीन डीओसी की कीमतों में 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है. बाजार में इसकी कीमत लगभग 65 से 66 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है. ये बढ़ोतरी पशु आहार तैयार करने वाली कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि डीओसी चारे में प्रोटीन का सबसे महत्वपूर्ण घटक माना जाता है. कीमत बढ़ने से चारा उत्पादन की लागत लगातार बढ़ रही है.

पोल्ट्री, मछली पालन और डेयरी क्षेत्र पर असर

सोयाबीन डीओसी की कमी का असर सिर्फ चारा उद्योग तक सीमित  नहीं है. पोल्ट्री, डेयरी और एक्वाकल्चर जैसे क्षेत्रों में भी इसकी वजह से लागत बढ़ रही है. मुर्गीपालन करने वाले किसानों को अधिक कीमत पर चारा खरीदना पड़ रहा है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ रही है. इसी तरह मछली पालन और पशुपालन से जुड़े किसानों पर भी अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है. इससे किसानों के मुनाफे पर दबाव बनने की आशंका है.

खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अहम क्षेत्र

विशेषज्ञों का कहना है कि पोल्ट्री, पशुपालन और जलीय कृषि क्षेत्र  देश की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. यदि चारे की लागत लगातार बढ़ती रही तो इन क्षेत्रों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है. इससे न केवल किसानों की आय पर असर पड़ेगा, बल्कि उपभोक्ताओं को भी पशु उत्पादों के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है. इसलिए चारा उद्योग से जुड़े लोग इस समस्या को गंभीरता से देख रहे हैं.

टिकाऊ समाधान की जरूरत

उद्योग जगत का मानना है कि सोयाबीन डीओसी  की उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सभी पक्षों को मिलकर काम करना होगा. किफायती और गुणवत्तापूर्ण चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करना समय की मांग है. विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित और दीर्घकालिक समाधान से किसानों के हितों की रक्षा की जा सकती है और पशुपालन, पोल्ट्री तथा जलीय कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाया जा सकता है. इससे देश की कृषि अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी.

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