मॉनसून में गाय-भैंसों पर सर्रा बीमारी का खतरा, विशेषज्ञ बोले- एक चूक से हो सकता भारी नुकसान

मॉनसून के मौसम में पशुओं में कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. विशेषज्ञों ने पशुपालकों को सर्रा नामक गंभीर बीमारी को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी है. यह बीमारी पशुओं की सेहत और दूध उत्पादन पर असर डाल सकती है. समय पर पहचान और बचाव के उपाय अपनाना बेहद जरूरी माना जा रहा है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Updated On: 12 Jun, 2026 | 03:23 PM

Surra Disease: मॉनसून के मौसम में जहां पशुओं के लिए हरा चारा और पानी की उपलब्धता बढ़ जाती है, वहीं कई संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. इन्हीं में से एक है सर्रा (Surra), जो गाय और भैंसों में होने वाली एक गंभीर रक्त जनित बीमारी है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम (केवीके नोएडा) के अनुसार बारिश के मौसम में खून चूसने वाली मक्खियों की संख्या बढ़ने से यह बीमारी तेजी से फैल सकती है. यदि समय रहते इसकी पहचान और उपचार नहीं किया गया तो पशु की मृत्यु तक हो सकती है.

सर्रा क्या है और कैसे फैलती है बीमारी?

पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार सर्रा बीमारी ट्रिपैनोसोमा इवैंसी (Trypanosoma evansi) नामक परजीवी के कारण होती है. ये परजीवी मुख्य रूप से टेबेनस और अन्य खून चूसने वाली मक्खियों के जरिए एक संक्रमित पशु  से दूसरे पशु में पहुंचता है. मॉनसून के दौरान खेतों और पशुशालाओं में नमी बढ़ने से मक्खियों का प्रकोप अधिक हो जाता है, जिससे संक्रमण फैलने की संभावना भी बढ़ जाती है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पशुशाला की साफ-सफाई पर ध्यान न दिया जाए तो बीमारी तेजी से कई पशुओं को अपनी चपेट में ले सकती है.

इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

सर्रा बीमारी के शुरुआती लक्षण सामान्य बुखार  जैसे दिखाई देते हैं, लेकिन समय के साथ यह गंभीर रूप ले सकती है. संक्रमित पशु को तेज बुखार आता है और शरीर का तापमान बार-बार बदलता रहता है. पशु सुस्त हो जाता है, चारा और पानी कम लेने लगता है तथा उसका वजन तेजी से घटने लगता है. दुधारू पशुओं में दूध उत्पादन अचानक कम हो सकता है. कई मामलों में पशु गोल-गोल घूमने लगता है, शरीर कांपता है और वह दीवार या जमीन पर सिर दबाने की कोशिश करता है. आंखों में सफेदी, अंधापन और पिछले हिस्से में लकवे जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं.

बचाव के लिए क्या करें?

कुंवर घनश्याम बताते हैं कि फिलहाल सर्रा बीमारी का कोई प्रभावी टीका उपलब्ध नहीं है. इसलिए बचाव ही सबसे बड़ा उपाय है. पशुपालकों को पशुशाला में मक्खियों और कीड़ों  को पनपने से रोकना चाहिए. नियमित रूप से कीटनाशक स्प्रे का उपयोग करना और पशुओं को साफ वातावरण में रखना जरूरी है. इसके अलावा नए खरीदे गए पशुओं को कुछ समय अलग रखकर उनकी जांच करवानी चाहिए, ताकि संक्रमण का खतरा कम हो सके.

समय पर उपचार से बच सकती है जान

विशेषज्ञों के अनुसार बीमारी के लक्षण दिखते ही पशुपालकों को तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए. चिकित्सकीय सलाह के अनुसार क्यूनापाइरामीन क्लोराइड (Quinapyramine Chloride) और आइसोमेटामिडियम (Isometamidium) जैसी दवाओं का उपयोग किया जाता है. समय पर इलाज मिलने पर पशु को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है. मॉनसून के दौरान पशुपालकों  को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है, क्योंकि थोड़ी सी लापरवाही पशुओं की सेहत और पशुपालकों की आय दोनों पर भारी पड़ सकती है.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

Published: 12 Jun, 2026 | 03:21 PM

लेटेस्ट न्यूज़