पेड़ में लीची के फल फटने से परेशान हैं किसान, एक्सपर्ट ने बताए बचाव के उपाय

बिहार समेत कई राज्यों में लीची, फल फटने और सनबर्न की समस्या से जूझ रही है, जिससे उत्पादन को 20 फीसदी तक नुकसान हुआ है. विशेषज्ञों के अनुसार, बोरॉन की कमी, जल प्रबंधन में गड़बड़ी और तेज तापमान इसके प्रमुख कारण हैं.

वेंकटेश कुमार
नोएडा | Updated On: 26 May, 2025 | 07:18 PM

बिहार सहित लगभग सभी राज्यों में लीची की टाई शुरू हो गई है. लेकिन मार्केट में जो लीची आ रही है उनके फल फटे हुए हैं. कहा जा रहा है कि सोषक तत्वों की कमी की वजह से ऐसा हुआ है. इससे किसानों को मार्केट में अच्छा रेट नहीं मिल रहा है. हालांकि, पादप रोग विभाग के हेड डॉ. एसके सिंह का कहना है कि लीची को उसके उत्कृष्ट स्वाद, रंग और सुगंध के चलते उसे ‘फलों की रानी’ कहा जाता है. लेकिन हाल के वर्षों में लीची उत्पादन को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. जिनमें प्रमुख हैं फल फटना (Fruit Cracking) और सनबर्न (Sunburn). ये दोनों समस्याएं फल की गुणवत्ता और उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं.

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, पूसा समस्तीपुर में पादप रोग विभाग के हेड डॉ. एसके सिंह ने किसान इंडिया से बात करते हुए कहा कि कई वजहों से लीची के फल फटते हैं. इसके पीछे कई कारक जिम्मेदार हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि पोषक तत्त्वों की कमी के वजह से भी फल फटते हैं. खास कर कैल्शियम (Ca) और बोरॉन (B) की कमी से फल का छिलका कमजोर हो जाता है, जिससे फल के फटने की संभावना बढ़ जाती है. उन्होंने कहा कि जल प्रबंधन में संतुलन नहीं होना भी फल फटने के कारण हो सकते हैं.

धूप और बारिश से भी नुकसान

उनके मुताबिक, लंबे समय तक सूखे के बाद अचानक अधिक बारिश होती है या किसान अधिक सिंचाई कर देते हैं, तो ऐसी स्थिति में फल के अंदर का गूदा तेजी से बढ़ता है, जबकि छिलका उतनी तेजी से नहीं बढ़ पाता, जिससे वह फट जाता है. उन्होंने कहा कि इसके अलावा मौसम में अचानक बदलाव आने से भी लीची में ये समस्या उत्पन्न हो जाती है. खास कर तापमान और आर्द्रता में अचानक वृद्धि या गिरावट आने से छिलके और गूदे के बीच दबाव असंतुलित हो जाता है. इससे फल फटने लगते हैं.

एसके सिंह ने कहा कि कभी-कभी बहुत ज्यादा धूप के बाद अचानक बारिश होने से छिलके की कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं. इससे गूदा पानी सोखकर फैलता है, जिसके चलते छिलका फट जाता है. साथ ही अगर किसान फसल की तुड़ाई में देरी करते हैं, तो इसका असर भी फल पर दिखता है. क्योंकि फल के पकने के बाद यदि समय पर तुड़ाई नही की गई, फटने की संभावना बढ़ जाती है.

तापमान बढ़ने से भी फल को नुकसान

उन्होंने कहा कि इस वर्ष अप्रैल महीने में कई दिनों तक अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा. इसके चलते लीची के छिलके की बाहरी कोशिकाएं तेज धूप से झुलस गईं. बाद में जब वर्षा हुई, तो फल के अंदर का गूदा पानी सोखकर फूल गया, लेकिन छिलका जो पहले ही क्षतिग्रस्त हो चुका था, वह फैल नहीं सका. ऐसे में फल फट गए.

लीची उत्पादन को बड़ा नुकसान

वर्तमान में अनुमान है कि सनबर्न और फल फटने की वजह से लीची उत्पादन को लगभग 25 से 30 प्रतिशत तक नुकसान हुआ है. यह स्थिति बहुत चिंताजनक है, क्योंकि यह न केवल किसानों की आमदनी को प्रभावित करती है, बल्कि उपभोक्ताओं को भी गुणवत्तायुक्त फल मिलने से वंचित करती है.

फलों को फटने से बचाने के लिए क्या करें

फलों को फटने से रोकने के लिए बोरॉन का समय पर इस्तेमाल करें. जिन क्षेत्रों में फल फटने की समस्या अधिक है, वहां 15 अप्रैल से पहले 4 ग्राम बोरेक्स को प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें. या फिर ऐसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग करें, जिनमें घुलनशील बोरॉन की मात्रा अधिक हो. अगर आप 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करते हैं, तो रिजल्ट अच्छा मिलेगा. जिन किसानों ने पिछले वर्ष 5 किग्रा बोरॉन प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में प्रयोग किया है, उन्हें अप्रैल में बोरॉन के छिड़काव करने की आवश्यकता नहीं है.

तापमान बढ़ने पर बाग में करें ये उपाय

फल विकास की पूरी अवधि में हल्की-हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे और पानी का तनाव न हो. ध्यान रहे कि पेड़ों के पास जलजमाव न हो, नहीं तो जड़ें सड़ सकती हैं. इसके अलावा बढ़ते तापमान से बचाव के लिए ओवरहेड स्प्रिंकलर प्रणाली को भी किसान अपना सकते हैं. जब दिन का तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर हो जाए, तो उस दिन कम से कम 4 घंटे तक स्प्रिंकलर चलाएं. इससे बाग के तापमान को 5 डिग्री सेल्सियस तक घटाया जा सकता है, जिससे फल को तेज धूप से राहत मिलेगी. इससे सनबर्न और फल फटने की समस्या में भारी कमी आती है.

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Published: 26 May, 2025 | 07:11 PM

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